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Holi 2026: आखिर क्यों मनाई जाती है होली? सिर्फ होलिका दहन ही नहीं, इन पौराणिक कथाओं से भी जुड़ा है रंगों का यह पर्व

होली भारत के सबसे प्राचीन और प्रमुख त्यौहारों में से एक है, जिसे हर साल फाल्गुन मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है। अधिकांश लोग इसे केवल भक्त प्रहलाद और होलिका की कहानी से जोड़कर देखते हैं, जहाँ बुराई की प्रतीक होलिका आग में जल गई और भगवान विष्णु के भक्त प्रहलाद सुरक्षित बच गए। होलिका दहन इसी जीत का प्रतीक है, लेकिन इसके अगले दिन रंग खेलने की परंपरा के पीछे भी कई दिलचस्प सामाजिक और धार्मिक कारण छिपे हैं।

रंगों वाली होली, जिसे 'धुलंडी' भी कहा जाता है, मुख्य रूप से भगवान श्रीकृष्ण और राधा रानी के प्रेम का प्रतीक मानी जाती है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, नटखट कृष्ण अपने सांवले रंग को लेकर माता यशोदा से शिकायत करते थे कि राधा इतनी गोरी क्यों हैं। तब माता यशोदा ने उन्हें सुझाव दिया कि वे राधा के चेहरे पर अपनी पसंद का कोई भी रंग लगा दें। कृष्ण ने गोपियों और राधा के साथ रंगों से ठिठोली की, और तब से ब्रज की होली और रंगों का यह उत्सव पूरी दुनिया में प्रसिद्ध हो गया।
एक अन्य प्राचीन कथा के अनुसार, होली का संबंध भगवान शिव और कामदेव से भी है। कहा जाता है कि जब कामदेव ने भगवान शिव की तपस्या भंग करने का प्रयास किया, तो शिव ने अपने तीसरे नेत्र से उन्हें भस्म कर दिया था। बाद में कामदेव की पत्नी रति की प्रार्थना पर शिव ने उन्हें पुनर्जीवित करने का आश्वासन दिया। कामदेव के पुनर्जन्म और प्रेम की विजय की खुशी में देवताओं ने रंग उत्सव मनाया था। यही कारण है कि होली को प्रेम और काम के देवता के आगमन के रूप में भी देखा जाता है।
धार्मिक कारणों के अलावा, होली का वैज्ञानिक और मौसमी महत्व भी है। यह पर्व वसंत ऋतु के आगमन और शीत ऋतु की विदाई का संकेत है। आयुर्वेद के अनुसार, बदलते मौसम में शरीर में आलस्य और सुस्ती आती है, जिसे दूर करने के लिए रंगों के जरिए उत्साह और ऊर्जा का संचार किया जाता है। साथ ही, पुराने समय में प्राकृतिक रंगों (जैसे पलाश के फूल और हल्दी) का उपयोग किया जाता था, जो त्वचा के लिए औषधि का काम करते थे। आज यह पर्व सभी आपसी मतभेदों को भुलाकर गले मिलने और भाईचारे का संदेश देने वाला 'महापर्व' बन चुका है।






