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अमीरी से कंगाली तक: सऊदी से ज्यादा तेल, फिर भी दाने-दाने को मोहताज वेनेजुएला; कभी शॉपिंग के लिए मियामी जाते थे लोग, आज कचरे में ढूंढ रहे खाना...

International 04 January 2026

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वेनेजुएला—एक ऐसा देश जिसके पास सऊदी अरब से भी अधिक तेल का भंडार है, आज इतिहास के सबसे बड़े आर्थिक पतन का सामना कर रहा है। कभी दक्षिण अमेरिका का सबसे समृद्ध और दुनिया का चौथा सबसे अमीर देश माना जाने वाला वेनेजुएला आज एक ऐसी स्थिति में है जहाँ उसकी 90% से अधिक आबादी गरीबी रेखा के नीचे है। यह कहानी एक चेतावनी है कि कैसे गलत सरकारी नीतियां और भ्रष्टाचार एक सोने की चिड़िया को भी पिंजरे में कैद कर सकते हैं।

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1970 के दशक में वेनेजुएला की चमक ऐसी थी कि यहाँ के मध्यम वर्ग के लोग वीकेंड पर शॉपिंग करने के लिए सीधे अमेरिका के मियामी जाते थे। उस दौर में यह देश अपनी आलीशान इमारतों, बेहतरीन बुनियादी ढांचे और प्रति व्यक्ति उच्च आय के लिए जाना जाता था। लेकिन, देश की पूरी अर्थव्यवस्था केवल एक ही चीज़ पर टिकी थी— तेल (Oil)। जब तक तेल की कीमतें आसमान छू रही थीं, तब तक मुफ्त बिजली, पानी और सरकारी सब्सिडी का दौर चलता रहा, लेकिन भविष्य के लिए कोई फंड नहीं बनाया गया।

वेनेजुएला की बर्बादी की शुरुआत तब हुई जब सत्ता की बागडोर हुगो शावेज और बाद में निकोलस मादुरो के हाथों में आई। सरकार ने निजी उद्योगों का राष्ट्रीयकरण कर दिया और खेती-किसानी पर ध्यान देना बंद कर दिया। नतीजा यह हुआ कि देश सुई से लेकर खाने तक के लिए दूसरे देशों पर निर्भर हो गया। जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतें गिरीं, तो वेनेजुएला का 'फ्री-बी कल्चर' ताश के पत्तों की तरह ढह गया।

आज हालात यह हैं कि वेनेजुएला की मुद्रा (Bolivar) की कोई कीमत नहीं रह गई है। वहां हाइपरइन्फ्लेशन (Hyperinflation) का आलम यह है कि एक ब्रेड का पैकेट खरीदने के लिए लोगों को बैग भरकर नोट ले जाने पड़ते हैं। अस्पतालों में दवाइयां नहीं हैं, बिजली-पानी की भारी किल्लत है और लोग पेट भरने के लिए कचरे के ढेरों में खाना ढूंढने को मजबूर हैं। इसी मजबूरी के कारण पिछले कुछ वर्षों में लाखों लोग देश छोड़कर पड़ोसी देशों में शरण ले चुके हैं।

हाल ही में अमेरिका द्वारा निकोलस मादुरो की गिरफ्तारी और सत्ता परिवर्तन की खबरों ने इस संकट को फिर से वैश्विक चर्चा के केंद्र में ला दिया है। विशेषज्ञों का मानना है कि वेनेजुएला की कंगाली केवल आर्थिक नहीं, बल्कि एक प्रशासनिक विफलता है। क्या नया नेतृत्व इस देश को फिर से उस पुराने गौरव पर लौटा पाएगा, यह अब भी एक बड़ा सवाल बना हुआ है।

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