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US-Iran Deal: अमेरिका के साथ समझौते को ईरान क्यों बता रहा है अपनी 'जीत'? जानें इन 5 बड़े कारणों का विश्लेषण

हाल के हफ्तों में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ओर से 'ईरानी सभ्यता को खत्म करने' जैसी कड़ी धमकियों के बाद, 7-8 अप्रैल 2026 को दोनों देशों के बीच दो सप्ताह के सीजफायर और समझौते की रूपरेखा पर सहमति बनी है। ईरान के सरकारी मीडिया और अधिकारियों का कहना है कि यह समझौता अमेरिका की "दबाव की नीति" की हार है। ईरान इसे अपनी जीत इसलिए बता रहा है क्योंकि उसने बिना किसी बड़े सैन्य नुकसान के अमेरिका को टेबल पर आने के लिए मजबूर कर दिया और अपने परमाणु कार्यक्रम व क्षेत्रीय प्रभाव पर कोई बड़ी आंच नहीं आने दी।

जमे हुए फंड की वापसी और प्रतिबंधों में ढील
ईरान की इस 'जीत' के पीछे सबसे बड़ा कारण आर्थिक है। समझौते के तहत, अमेरिका ईरान के विदेशों में जमे हुए अरबों डॉलर के फंड (Frozen Assets) को रिलीज करने पर सहमत होता दिख रहा है। इसके साथ ही, तेल निर्यात और बैंकिंग क्षेत्र पर लगे कुछ कड़े प्रतिबंधों में ढील मिलने की संभावना है। ईरान के विदेश मंत्रालय का मानना है कि ट्रंप प्रशासन का युद्ध से पीछे हटना और बातचीत का रास्ता चुनना यह साबित करता है कि अमेरिकी प्रतिबंध अब बेअसर हो रहे हैं और वैश्विक ऊर्जा संकट ने वाशिंगटन को झुकने पर मजबूर कर दिया है।
होर्मुज की खाड़ी पर नियंत्रण का दांव
रणनीतिक मोर्चे पर, ईरान ने होर्मुज की खाड़ी (Strait of Hormuz) को सुरक्षित व्यापार के लिए खोलने के बदले अपनी शर्तें मनवाई हैं। ईरान का दावा है कि उसने दुनिया को अपनी सैन्य ताकत का अहसास कराया कि वह वैश्विक तेल सप्लाई को रोकने की क्षमता रखता है। बीबीसी की रिपोर्ट के अनुसार, पाकिस्तान की मध्यस्थता में हुई इस वार्ता में ईरान ने यह सुनिश्चित किया कि क्षेत्रीय सुरक्षा में उसकी भूमिका को नकारा नहीं जा सकता। अमेरिका का 15-सूत्रीय शांति प्रस्ताव स्वीकार करना ईरान के लिए एक कूटनीतिक कवच जैसा है।
ट्रंप की घरेलू चुनौतियां और ईरान की रणनीति
राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि ईरान ने राष्ट्रपति ट्रंप की घरेलू चुनौतियों, जैसे बढ़ती तेल की कीमतें और आगामी चुनावों को भांप लिया था। ईरान का तर्क है कि अमेरिका एक और लंबा युद्ध वहन नहीं कर सकता। ईरान के लिए अपनी जीत का नैरेटिव सेट करना इसलिए भी जरूरी है ताकि वह अपने नागरिकों को यह दिखा सके कि "इस्लामी क्रांति" के आदर्शों ने दुनिया की महाशक्ति को पीछे हटने पर मजबूर कर दिया। फिलहाल यह सीजफायर केवल दो सप्ताह का है, लेकिन इसे ईरान एक बड़े मनोवैज्ञानिक लाभ के रूप में देख रहा है।






