वॉशिंगटन डीसी में अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप द्वारा नवगठित ‘बोर्ड ऑफ पीस’ की पहली उच्च स्तरीय बैठक आयोजित की गई। इस बोर्ड का मुख्य उद्देश्य दुनिया के विभिन्न हिस्सों में जारी युद्धों और संघर्षों को समाप्त कर वैश्विक स्थिरता कायम करना है। इस ऐतिहासिक बैठक में भारत ने एक ‘पर्यवेक्षक’ (Observer) के तौर पर हिस्सा लेकर अपनी वैश्विक महत्ता को एक बार फिर साबित किया है। भारत की ओर से वरिष्ठ राजनयिकों ने इस चर्चा में भाग लिया, जो यह दर्शाता है कि दुनिया के बड़े मसलों को सुलझाने में अब भारत की भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
बैठक के दौरान रूस-यूक्रेन युद्ध और मध्य पूर्व (इजरायल-हमास) के तनाव को कम करने के लिए रोडमैप तैयार करने पर चर्चा हुई। राष्ट्रपति ट्रंप ने अपनी ‘अमेरिका फर्स्ट’ नीति के साथ-साथ ‘शांति के माध्यम से शक्ति’ (Peace through Strength) के विजन को साझा किया। पर्यवेक्षक के रूप में भारत की उपस्थिति ने इस पहल को और अधिक संतुलित बना दिया है, क्योंकि भारत के संबंध रूस और अमेरिका दोनों के साथ मजबूत हैं। जानकारों का मानना है कि भारत इस मंच पर एक मध्यस्थ या संतुलित सलाहकार की भूमिका निभा सकता है, जो वैश्विक शांति की दिशा में नई दिल्ली के बढ़ते कद का प्रतीक है।
इस बैठक के बाद अंतरराष्ट्रीय राजनीति में नई हलचल शुरू हो गई है। ट्रंप प्रशासन का यह कदम यह संकेत देता है कि अमेरिका अब सीधे टकराव के बजाय कूटनीतिक वार्ताओं और वैश्विक सहयोग के जरिए विवादों को सुलझाने पर जोर देगा। भारत की सक्रिय भागीदारी ने यह स्पष्ट कर दिया है कि प्रधानमंत्री मोदी का विजन "यह युद्ध का युग नहीं है" अब वैश्विक स्तर पर नीति निर्माण का हिस्सा बन रहा है। इस बैठक के परिणामों और आने वाले समय में बनने वाली रणनीतियों पर अब पूरी दुनिया की नजरें टिकी हुई हैं।








