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राजनीतिक दोराहे पर शशि थरूर: क्या कांग्रेस में सिमट रहा है उनका भविष्य...
वरिष्ठ पत्रकार आरती जेरथ के अनुसार, कांग्रेस के दिग्गज नेता और तिरुवनंतपुरम के सांसद शशि थरूर इस समय एक महत्वपूर्ण राजनीतिक दोराहे पर खड़े हैं। पिछले कुछ समय से पार्टी के भीतर उनकी सक्रियता और नेतृत्व की आकांक्षाओं ने उन्हें चर्चा में रखा है, लेकिन अब सवाल यह उठ रहा है कि क्या कांग्रेस का 'हाईकमान' और पुराने वफादार उन्हें वह स्थान देंगे जिसके वे हकदार हैं। मल्लिकार्जुन खड़गे के खिलाफ अध्यक्ष पद का चुनाव लड़ने के बाद से थरूर के लिए पार्टी के भीतर की राहें पहले के मुकाबले अधिक चुनौतीपूर्ण नजर आ रही हैं।

कांग्रेस के भीतर थरूर की स्थिति एक ऐसे 'आउटसाइडर' की बनी हुई है, जिनकी बौद्धिक क्षमता और अंतरराष्ट्रीय छवि का लोहा तो माना जाता है, लेकिन जमीनी राजनीति और संगठन पर उनकी पकड़ को लेकर संशय जताया जाता है। जेरथ का तर्क है कि थरूर ने खुद को जी-23 समूह से अलग कर एक स्वतंत्र पहचान बनाने की कोशिश की, मगर पार्टी के आंतरिक समीकरणों ने उन्हें हाशिए पर धकेलने की कोशिशें तेज कर दी हैं। केरल की स्थानीय राजनीति में भी उनकी बढ़ती लोकप्रियता वहां के स्थापित नेताओं के लिए चिंता का विषय बनी हुई है।
इस कॉलम में इस बात पर भी जोर दिया गया है कि थरूर का अगला कदम उनके राजनीतिक भविष्य को तय करेगा। क्या वे कांग्रेस के भीतर रहकर एक 'असंतोषी' सुधारक की भूमिका निभाते रहेंगे, या फिर वे अपनी संभावनाओं को पार्टी से बाहर तलाशेंगे? वर्तमान में विपक्षी गठबंधन 'INDIA' में उनकी भूमिका केवल एक वक्ता तक सीमित दिखती है, जबकि उनकी क्षमताएं इससे कहीं अधिक व्यापक हैं। पार्टी नेतृत्व द्वारा उन्हें महत्वपूर्ण नीतिगत निर्णयों से दूर रखना उनके समर्थकों के बीच निराशा पैदा कर रहा है।
अंततः, शशि थरूर के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वे खुद को केवल एक 'विद्वान नेता' की छवि से बाहर निकालकर एक 'जननेता' के रूप में कैसे स्थापित करते हैं। आरती जेरथ का विश्लेषण संकेत देता है कि यदि कांग्रेस ने थरूर की प्रतिभा का सही उपयोग नहीं किया, तो वे भारतीय राजनीति के उन चेहरों में शुमार हो जाएंगे जो योग्यता के बावजूद व्यवस्था की भेंट चढ़ गए। आने वाले समय में केरल विधानसभा चुनाव और कांग्रेस की आंतरिक नियुक्तियां यह स्पष्ट करेंगी कि थरूर का अगला पड़ाव क्या होगा।







