आज, 29 जनवरी 2026 को सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची की पीठ ने यूजीसी के नए नियमों को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई की। सुनवाई के दौरान सीजेआई ने अत्यंत सख्त लहजे में कहा:
"हमें एक जातिविहीन (Casteless) समाज की ओर बढ़ना चाहिए, लेकिन क्या हम पीछे जा रहे हैं? क्या हम उल्टी दिशा में जा रहे हैं? जिन्हें सुरक्षा चाहिए, उनके लिए व्यवस्था होनी चाहिए, लेकिन ये नियम अस्पष्ट हैं और इनका दुरुपयोग हो सकता है।"
अदालत ने यह भी चेतावनी दी कि बराबरी की आड़ में नया भेदभाव पैदा करना संविधान की मूल भावना के खिलाफ है।
क्यों लगा स्टे? (प्रमुख कारण)
सुप्रीम कोर्ट ने यूजीसी के 'उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता को बढ़ावा देने (Equity) के विनियम, 2026' पर अंतरिम रोक लगा दी है। इसके पीछे मुख्य आपत्तियां निम्नलिखित हैं:
'एकतरफा' भेदभाव का आरोप: याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि नियम 3(c) में जाति-आधारित भेदभाव को केवल आरक्षित वर्गों (SC/ST/OBC) के संदर्भ में परिभाषित किया गया है, जो 'रिवर्स डिस्क्रिमिनेशन' (उल्टा भेदभाव) को बढ़ावा दे सकता है।
सामान्य वर्ग की अनदेखी: कोर्ट में दलील दी गई कि ये नियम इस धारणा पर आधारित हैं कि भेदभाव केवल एक दिशा में होता है, जबकि सामान्य वर्ग के छात्र भी शैक्षणिक संस्थानों में प्रताड़ना या भेदभाव का शिकार हो सकते हैं।
दुरुपयोग की आशंका: कोर्ट ने माना कि नियमों की भाषा 'अस्पष्ट' (Vague) है, जिससे इनका गलत इस्तेमाल हो सकता है और परिसरों में एकता की जगह अलगाव बढ़ सकता है।
2012 के पुराने नियम रहेंगे प्रभावी
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि जब तक इस मामले का अंतिम फैसला नहीं हो जाता, तब तक यूजीसी के 2012 वाले नियम ही लागू रहेंगे। नए रेगुलेशन, जिन्हें 13 जनवरी 2026 को नोटिफाई किया गया था, अब ठंडे बस्ते में चले गए हैं।
केंद्र सरकार और विशेषज्ञों से जवाब तलब
अदालत ने केंद्र सरकार और यूजीसी को नोटिस जारी कर 19 मार्च 2026 तक जवाब मांगा है। सीजेआई ने सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता से कहा कि सरकार को इस मामले की जांच के लिए प्रतिष्ठित विशेषज्ञों और विद्वानों की एक समिति गठित करने पर विचार करना चाहिए, जो सामाजिक मूल्यों और संवैधानिक अधिकारों के संतुलन को समझें।
देशभर में आक्रोश और इस्तीफे
यूजीसी के इन नए नियमों को लेकर देशभर के शैक्षणिक संस्थानों में उबाल है। सवर्ण समाज और शिक्षक संगठनों ने इसे 'भेदभावपूर्ण' बताया है। इस विवाद के बीच बरेली के सिटी मजिस्ट्रेट अलंकार अग्निहोत्री ने भी विरोध स्वरूप इस्तीफा दे दिया था, जिसने इस चर्चा को और हवा दे दी।







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