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Republic Day 2026: कर्तव्य पथ पर लद्दाख के 'Silent Warriors' का जलवा; पहली बार ऊंटों के साथ शिकारी बाज भी भरेंगे हुंकार

National RRT News Desk 18 January 2026

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नई दिल्ली: गणतंत्र दिवस 2026 की परेड इस बार ऐतिहासिक होने जा रही है। भारत के सैन्य इतिहास में पहली बार 'कर्तव्य पथ' पर भारतीय सेना का एक विशेष पशु दस्ता मार्च पास्ट करेगा। इस दस्ते का सबसे बड़ा आकर्षण लद्दाख के दुर्लभ दो कूबड़ वाले बैक्ट्रियन ऊंट और आसमान की ऊंचाइयों से दुश्मन के ड्रोन को नेस्तनाबूद करने वाले शिकारी बाज (रैप्टर्स) होंगे। यह परेड न केवल भारत की सैन्य ताकत, बल्कि दुर्गम इलाकों में सेना के अटूट धैर्य और पशु-मानव के अद्भुत तालमेल को दुनिया के सामने प्रदर्शित करेगी।

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लद्दाख के नुब्रा घाटी से आए ये दो कूबड़ वाले ऊंट पूर्वी लद्दाख के उन ठंडे रेगिस्तानों में तैनात हैं, जहां तापमान -40°C तक गिर जाता है। समुद्र तल से 15,000 फीट की ऊंचाई पर जहां ऑक्सीजन की कमी होती है, ये ऊंट 250 किलो तक का भार उठाकर मीलों तक पेट्रोलिंग कर सकते हैं। हाल ही में सेना में शामिल किए गए इन ऊंटों को 'साइलेंट वॉरियर्स' कहा जाता है, क्योंकि ये उन रास्तों पर रसद पहुंचाने में सक्षम हैं जहां मशीनें और वाहन भी फेल हो जाते हैं।

इस बार परेड में शामिल होने वाले 'शिकारी पक्षी' (बाज और ईगल) भी आकर्षण का केंद्र रहेंगे। इन्हें विशेष रूप से ड्रोन हंटर के रूप में प्रशिक्षित किया गया है। सीमा पार से आने वाले संदिग्ध ड्रोन्स को हवा में ही पहचानने और उन्हें गिराने की इनकी क्षमता भारतीय सेना की आधुनिक एंटी-ड्रोन तकनीक का हिस्सा है। इनके साथ ही लद्दाख के मजबूत 'जांस्कर पोनी' (पहाड़ी टट्टू) और भारतीय नस्ल के प्रशिक्षित सैन्य कुत्ते भी मार्च पास्ट में शामिल होकर सेना की बहुआयामी सुरक्षा रणनीति की झलक दिखाएंगे।

2026 की गणतंत्र दिवस परेड का मुख्य विषय 'वंदे मातरम के 150 वर्ष' रखा गया है। रक्षा सचिव के अनुसार, इस बार की परेड केवल औपचारिक प्रदर्शन नहीं, बल्कि एक 'बैटल एरे' (Battle Array) होगी, जो यह दिखाएगी कि भारतीय सेना युद्ध के मैदान में वास्तविक परिस्थितियों में कैसे काम करती है। लद्दाख स्काउट्स और इस विशेष पशु दस्ते की मौजूदगी यह संदेश देगी कि भारत की सीमाएं आसमान से लेकर बर्फीले रेगिस्तान तक पूरी तरह सुरक्षित हैं।

परेड की तैयारियों के बीच कर्तव्य पथ पर रिहर्सल जारी है। इन मूक योद्धाओं की उपस्थिति न केवल लद्दाख की समृद्ध जैव-विविधता और संस्कृति को दर्शाती है, बल्कि यह आत्मनिर्भर भारत के तहत स्वदेशी नस्लों के सैन्यीकरण की दिशा में एक बड़ा कदम है। 26 जनवरी को जब ये ऊंट और बाज राष्ट्रपति को सलामी देंगे, तो यह दृश्य करोड़ों भारतीयों के मन में गर्व और नए भारत के संकल्प को और मजबूत करेगा।

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