जैसे-जैसे हम वर्ष 2025 की विदाई की ओर बढ़ रहे हैं, दुनिया भर में एक नया और सशक्त स्लोगन गूंज रहा है— "मोबाइल फोन के परे भी जिंदगी है।" एन. रघुरामन अपने लेख में बताते हैं कि पिछले एक दशक में जिस स्मार्टफोन को हमने अपनी 'तीसरी आंख' और 'छठी इंद्री' बना लिया था, अब उससे एक तरह की मानसिक थकान (Digital Fatigue) महसूस होने लगी है। लोग अब स्क्रीन की नीली रोशनी से निकलकर हकीकत की धूप और अपनों के साथ वास्तविक समय बिताने की अहमियत को फिर से पहचान रहे हैं।
रील और रियल के बीच की दूरी
लेखक के अनुसार, 2025 वह साल रहा जहाँ लोगों ने यह महसूस किया कि 'लाइक' और 'कमेंट' की संख्या से उनके व्यक्तित्व या खुशी का पैमाना तय नहीं होता। उन्होंने कई उदाहरणों के जरिए बताया है कि कैसे अब युवा पीढ़ी भी 'स्मार्टफोन' के बजाय 'स्मार्ट लाइफ' को चुन रही है। रेस्तरां में 'नो फोन जोन' और शादियों में 'डिजिटल फ्री' शादियों का चलन यह बता रहा है कि हम अब वर्चुअल दुनिया के दिखावे से ऊब चुके हैं।
यादों का संरक्षण और एकाग्रता
रघुरामन ने ध्यान दिलाया है कि मोबाइल फोन ने हमारी एकाग्रता (Attention Span) को बहुत कम कर दिया था। हम किसी खूबसूरत नज़ारे को अपनी आंखों से देखने के बजाय कैमरे के लेंस से कैद करने में ज्यादा व्यस्त थे। लेकिन अब लोग फिर से 'जीने' और 'देखने' के बीच का फर्क समझ रहे हैं। 2025 ने हमें सिखाया है कि बिना फोन के बिताया गया समय हमें अधिक शांति, बेहतर नींद और मजबूत सामाजिक संबंध प्रदान करता है।
2026 के लिए एक नया संकल्प
लेख के अंत में वह सुझाव देते हैं कि 2025 की विदाई पर यह स्लोगन केवल एक नारा न बनकर एक जीवनशैली बनना चाहिए। मोबाइल एक 'साधन' होना चाहिए, न कि हमारा 'मालिक'। 2026 में कदम रखते हुए समाज का बड़ा वर्ग अब 'नोटिफिकेशन' से मुक्त होकर 'नेचर' (प्रकृति) के करीब आने का संकल्प ले रहा है। यह विदाई एक नई शुरुआत है—एक ऐसी दुनिया की जहाँ इंसान स्क्रीन से ऊपर एक-दूसरे के चेहरों को देख रहा है।








