मोहला-मानपुर-अंबागढ़ चौकी: सरकार और सिस्टम जब आंखें मूंद ले, तो जनशक्ति कैसे रास्ता निकालती है, इसका जीता-जागता उदाहरण ग्राम बरारमुंडी के ग्रामीणों ने पेश किया है। शिवनाथ नदी के किनारे बसे इस गांव पर हर साल बाढ़ और कटाव का खतरा मंडराता है। बार-बार गुहार लगाने के बाद भी जब जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों ने सुध नहीं ली, तो ग्रामीणों ने 'श्रमदान और अंशदान' का रास्ता चुना।
सांसद से लेकर प्रशासन तक सब रहे बेअसर
ग्रामीणों का आरोप है कि उन्होंने अपनी समस्या को लेकर स्थानीय प्रशासन से लेकर सांसद तक के चक्कर लगाए। शिवनाथ नदी के बढ़ते जलस्तर के कारण न केवल गांव के घरों को खतरा है, बल्कि मुख्य मार्ग के भी नदी में समा जाने की आशंका बनी रहती है। हर बार आश्वासन तो मिला, लेकिन धरातल पर कोई ठोस सुरक्षा दीवार या पचरी का निर्माण नहीं हुआ।
एकजुटता की मिसाल: बच्चे से लेकर बुजुर्ग तक जुटे
जब मदद की उम्मीदें टूट गईं, तो ग्रामीणों ने आपसी सहमति से चंदा इकट्ठा किया। जुटाए गए पैसों से सीमेंट, छड़ और ईंटें खरीदी गईं। अब गांव का हर वर्ग—चाहे वे महिलाएं हों, युवा हों या बुजुर्ग—तपती धूप में नदी किनारे पचरी और सुरक्षा दीवार बनाने के लिए श्रमदान कर रहा है।
आत्मनिर्भरता: ग्रामीणों ने राजमिस्त्री से लेकर लेबर तक का काम खुद संभाल लिया है।
उद्देश्य: नदी के कटाव को रोकना और मानसून से पहले गांव की सुरक्षा सुनिश्चित करना।
संदेश: बरारमुंडी के लोगों ने यह साबित कर दिया है कि अगर इच्छाशक्ति हो, तो बजट का इंतजार किए बिना भी बड़े काम किए जा सकते हैं।
सोशल मीडिया पर हो रही सराहना
ग्रामीणों के इस जज्बे की तस्वीरें सोशल मीडिया पर खूब वायरल हो रही हैं। लोग जहां एक ओर ग्रामीणों की हिम्मत को सलाम कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर सिस्टम की लाचारी और जनप्रतिनिधियों की उदासीनता पर सवाल भी उठा रहे हैं। फिलहाल, गांव में 'सुरक्षा की दीवार' का काम युद्ध स्तर पर जारी है ताकि आने वाले मानसून में शिवनाथ का पानी गांव को नुकसान न पहुँचा सके।







