पुरी। भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा के पवित्र महास्नान के साथ विश्व प्रसिद्ध रथ यात्रा उत्सव की धार्मिक प्रक्रियाओं की शुरुआत हो जाती है। सनातन परंपरा के अनुसार महास्नान के बाद भगवान को ज्वर (बीमार) होने की मान्यता है, जिसके कारण वे कुछ दिनों तक भक्तों को दर्शन नहीं देते। इस अवधि को अनावसार कहा जाता है।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार महास्नान के दौरान 108 कलशों के पवित्र जल से भगवान का अभिषेक किया जाता है। इसके बाद भगवान विश्राम के लिए विशेष कक्ष में विराजमान होते हैं, जहां उनकी सेवा और उपचार किया जाता है। इस दौरान मंदिर के गर्भगृह में आम श्रद्धालुओं के लिए दर्शन बंद रहते हैं।
अनावसार की अवधि समाप्त होने के बाद भगवान नवयौवन रूप में भक्तों को दर्शन देते हैं, जिसे नवयौवन दर्शन कहा जाता है। इसके बाद भव्य रथ यात्रा निकाली जाती है, जिसमें लाखों श्रद्धालु भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा के रथों को खींचकर पुण्य लाभ प्राप्त करते हैं।
धार्मिक दृष्टि से अनावसार भगवान के विश्राम, उपचार और पुनः नवयौवन प्राप्त करने का प्रतीक माना जाता है। यही परंपरा जगन्नाथ संस्कृति की सबसे अनूठी और विशेष परंपराओं में से एक है।







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