मिडिल ईस्ट में इजरायल और अमेरिका के ईरान पर हमलों के बाद वैश्विक ऊर्जा बाजार में भारी उथल-पुथल मची हुई है। विशेषज्ञों का अनुमान है कि यदि यह संघर्ष लंबा खिंचता है और सामरिक रूप से महत्वपूर्ण होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) बंद होता है, तो कच्चे तेल (Crude Oil) की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल के मनोवैज्ञानिक स्तर को पार कर सकती हैं। वर्तमान में ब्रेंट क्रूड की कीमतें पहले ही 80 डॉलर के करीब पहुंच चुकी हैं। दुनिया का लगभग 20% तेल इसी समुद्री रास्ते से गुजरता है, जिसके ठप होने से वैश्विक स्तर पर ईंधन की भारी किल्लत और महंगाई का खतरा मंडरा रहा है।
भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरतों का लगभग 88% आयात करता है, इसलिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में होने वाली हर छोटी हलचल का सीधा असर देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। बाजार विश्लेषकों का मानना है कि यदि कच्चा तेल 100 डॉलर के पार स्थिर रहता है, तो भारत के लिए अपना आयात बिल संभालना मुश्किल होगा। हालांकि, अभी तक घरेलू बाजार में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में कोई बदलाव नहीं किया गया है, लेकिन तेल कंपनियों पर बढ़ती लागत का बोझ अंततः आम जनता की जेब पर पड़ सकता है। कुछ अनुमानों के अनुसार, ऐसी स्थिति में पेट्रोल की कीमतें ₹150 प्रति लीटर तक भी पहुंच सकती हैं।
फिलहाल, केंद्र सरकार और सरकारी तेल कंपनियां (IOC, BPCL, HPCL) स्थिति पर पैनी नजर रखे हुए हैं। सूत्रों के अनुसार, तेल कंपनियों के पास पुराने मुनाफे का कुछ 'बफर' मौजूद है, जिससे वे तात्कालिक कीमतों में बढ़ोत्तरी को कुछ समय के लिए टाल सकती हैं। भारत के पास अपनी रणनीतिक तेल भंडार (Strategic Petroleum Reserves) भी है, जो आपातकालीन स्थिति में कुछ हफ्तों की आपूर्ति सुनिश्चित कर सकता है। लेकिन यदि युद्ध क्षेत्र का विस्तार होता है और सऊदी अरब या यूएई के तेल प्रतिष्ठानों पर हमले होते हैं, तो कीमतों को नियंत्रित करना सरकार के लिए एक बड़ी चुनौती होगी।
युद्ध के कारण न केवल ईंधन, बल्कि माल ढुलाई और लॉजिस्टिक्स की लागत भी बढ़ेगी, जिससे खाने-पीने की वस्तुओं से लेकर रोजमर्रा के सामानों की कीमतों में भारी उछाल आने की आशंका है। शेयर बाजार भी इस अनिश्चितता के कारण अस्थिर बना हुआ है। विशेषज्ञों की राय है कि निवेशकों और आम उपभोक्ताओं को आने वाले हफ्तों में कड़ी वित्तीय चुनौतियों के लिए तैयार रहना चाहिए। पूरी दुनिया अब कूटनीतिक रास्तों की ओर देख रही है ताकि इस ऊर्जा संकट को टालने के लिए युद्धविराम की कोई गुंजाइश बन सके।








