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1971 के बाद सबसे गंभीर संकट: संसदीय पैनल ने बांग्लादेश को बताया भारत के लिए 'बड़ी रणनीतिक चुनौती'...

विदेश मामलों की संसदीय स्थायी समिति (Parliamentary Standing Committee on External Affairs) ने एक महत्वपूर्ण रिपोर्ट में चेतावनी दी है कि 1971 के मुक्ति संग्राम के बाद से वर्तमान समय में बांग्लादेश भारत के लिए सबसे बड़ी रणनीतिक चुनौती बनकर उभरा है। पैनल के अनुसार, अगस्त 2024 में शेख हसीना सरकार के पतन के बाद से वहां सुरक्षा और कूटनीतिक शून्य पैदा हो गया है। सांसदों ने इस बात पर गहरी चिंता जताई है कि बांग्लादेश अब धीरे-धीरे भारत-केंद्रित नीतियों से दूर होकर एक ऐसे रास्ते पर बढ़ रहा है जो क्षेत्रीय स्थिरता के लिए जोखिम भरा हो सकता है।

समिति की बैठकों में विशेषज्ञों और सांसदों ने विशेष रूप से बांग्लादेश में 'इस्लामी कट्टरपंथ' के बढ़ते प्रभाव को रेखांकित किया है। रिपोर्ट के अनुसार, जमात-ए-इस्लामी जैसे संगठनों पर से प्रतिबंध हटना और कट्टरपंथी विचारधाराओं का मुख्यधारा में आना भारत की आंतरिक सुरक्षा, विशेषकर पश्चिम बंगाल और उत्तर-पूर्वी राज्यों के लिए सीधा खतरा है। कट्टरपंथी ताकतों के बढ़ने से न केवल अल्पसंख्यक समुदायों पर हमले बढ़े हैं, बल्कि यह भारत के खिलाफ नफरत फैलाने वाली गतिविधियों का केंद्र भी बन सकता है।
पैनल ने 'चीन और पाकिस्तान' के बढ़ते दखल को इस संकट का सबसे खतरनाक पहलू बताया है। जून 2025 में कुनमिंग (चीन) में हुई चीन-पाकिस्तान-बांग्लादेश की त्रिपक्षीय बैठक इस बात का संकेत है कि ढाका अब बीजिंग और इस्लामाबाद के सुरक्षा ढांचे में शामिल हो रहा है। चीन द्वारा सैन्य उपकरणों की आपूर्ति और पाकिस्तान के साथ बढ़ती सैन्य ट्रेनिंग भारत को घेरने की एक बड़ी साजिश का हिस्सा हो सकती है। यह नया 'त्रिकोणीय गठबंधन' दक्षिण एशिया में भारत के पारंपरिक प्रभुत्व को चुनौती देने की क्षमता रखता है।
इन चुनौतियों का सामना करने के लिए संसदीय पैनल ने 'सॉफ्ट पावर' और 'आर्थिक सहयोग' को ही एकमात्र स्थायी रणनीतिक हल बताया है। समिति ने सुझाव दिया है कि भारत को बांग्लादेश के विकास कार्यों में अपना सहयोग जारी रखना चाहिए और सांस्कृतिक कूटनीति (Cultural Diplomacy) के जरिए वहां की जनता से दोबारा जुड़ना चाहिए। पत्रकारों के आदान-प्रदान और लोगों से लोगों के बीच संपर्क (People-to-People Contact) बढ़ाकर उन गलतफहमियों को दूर किया जा सकता है जिन्हें बाहरी शक्तियां हवा दे रही हैं। केवल संतुलित और विकासोन्मुखी भागीदारी ही बांग्लादेश को चीन-पाक के प्रभाव से बाहर ला सकती है।







