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डिजिटल बेड़ियाँ! मोबाइल की लत बन रही है मानसिक बीमारी, जानें कैसे आज़ाद हों?


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RRT News: आज के दौर में स्मार्टफोन हमारी हथेली का हिस्सा बन चुका है, लेकिन यह सुविधा कब एक 'खतरनाक लत' में बदल गई, हमें पता भी नहीं चला। शोध बताते हैं कि जब हम सोशल मीडिया पर 'लाइक' या 'नोटिफिकेशन' देखते हैं, तो हमारे मस्तिष्क में डोपामाइन (Dopamine) नामक रसायन रिलीज होता है, जो हमें वैसी ही खुशी देता है जैसी किसी नशीले पदार्थ के सेवन से मिलती है। यही कारण है कि 'नोमोफोबिया' (फोन खोने या दूर होने का डर) आज के युवाओं में तेजी से बढ़ रहा है, जिससे एकाग्रता की कमी, अनिद्रा और चिड़चिड़ापन जैसी समस्याएँ पैदा हो रही हैं।

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इस लत से निपटने का सबसे पहला और प्रभावी कदम है 'नोटिफिकेशन का कड़ा नियंत्रण'। मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि फोन की हर 'बीप' हमारे ध्यान को भंग करती है। समाधान के रूप में, केवल महत्वपूर्ण कॉल्स और वर्क-मैसेज को छोड़कर बाकी सभी सोशल मीडिया ऐप्स के नोटिफिकेशन बंद कर देने चाहिए। जब स्क्रीन बार-बार चमकेगी नहीं, तो उसे उठाने की हमारी इच्छा स्वतः ही कम होने लगेगी। यह एक छोटा सा बदलाव आपके दिन भर के 30 से 40 प्रतिशत स्क्रीन टाइम को कम कर सकता है।

दूसरा महत्वपूर्ण उपाय 'ग्रेस्केल मोड' और 'नो-फोन ज़ोन' का कड़ाई से पालन करना है। रंगीन और चमकदार स्क्रीन हमारे दिमाग को आकर्षित करती है; अगर आप फोन की सेटिंग्स में जाकर इसे 'ब्लैक एंड व्हाइट' (Grayscale) कर दें, तो फोन इस्तेमाल करना उबाऊ लगने लगेगा। इसके साथ ही घर में कुछ क्षेत्र जैसे कि डाइनिंग टेबल और बेडरूम को 'नो-फोन ज़ोन' घोषित करें। रात को सोने से कम से कम एक घंटा पहले फोन को खुद से दूर रखना मानसिक शांति और गहरी नींद के लिए अनिवार्य है।  

तकनीक को मात देने के लिए 'एनालॉग विकल्पों' की ओर लौटना एक बेहतरीन रणनीति है। हम अक्सर समय देखने के बहाने फोन उठाते हैं और फिर घंटों रील्स देखने में बिता देते हैं। इसका सरल समाधान है कलाई घड़ी पहनना और सुबह जगाने के लिए फोन के बजाय एक अलार्म क्लॉक का इस्तेमाल करना। इसके अलावा, ई-बुक्स के बजाय कागजी किताबें पढ़ने की आदत डालें। जब आप डिजिटल माध्यमों को भौतिक वस्तुओं से बदल देते हैं, तो फोन पर आपकी निर्भरता अपने आप कम होने लगती है।

अंततः, मोबाइल एडिक्शन से मुक्ति एक दिन में नहीं मिलती, इसके लिए 'डिजिटल डिटॉक्स' को जीवनशैली का हिस्सा बनाना होगा। सप्ताह में कम से कम एक दिन या दिन का कुछ समय 'फोन-फ्री' रखें और उस समय को अपनी पुरानी हॉबी, जैसे पेंटिंग, खेल या परिवार के साथ बातचीत में बिताएं। खुद पर नियंत्रण और सचेत प्रयास ही हमें स्क्रीन की इस आभासी दुनिया से बाहर निकालकर वास्तविक जीवन की खुशियों से जोड़ सकते हैं। याद रखें, फोन आपकी सुविधा के लिए है, आप फोन की सुविधा के लिए नहीं।  

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