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ऐतिहासिक फैसला: 6 महीने की प्रेग्नेंट रेप पीड़िता को हाईकोर्ट ने दी अबॉर्शन की इजाजत; कहा- 'पीड़िता को अपना भविष्य चुनने का पूरा अधिकार'...

National 23 December 2025

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न्यायपालिका ने एक बार फिर संवेदनशीलता का परिचय देते हुए विंटर वेकेशन (शीतकालीन अवकाश) के दौरान एक अत्यंत महत्वपूर्ण मामले की सुनवाई की। हाईकोर्ट ने 6 महीने (करीब 24 सप्ताह) की एक गर्भवती दुष्कर्म पीड़िता को गर्भपात (Abortion) कराने की अनुमति दे दी है। आमतौर पर 20 से 24 सप्ताह के बाद गर्भपात के लिए कानूनी पेचीदगियां बढ़ जाती हैं, लेकिन मामले की गंभीरता और पीड़िता की मानसिक स्थिति को देखते हुए अदालत ने तत्काल राहत प्रदान की है।

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फैसला सुनाते समय माननीय हाईकोर्ट ने टिप्पणी की कि किसी भी पीड़िता को उस गर्भ को ढोने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता जो उसके साथ हुए अपराध की परिणति है। अदालत ने कहा, "प्रत्येक महिला को अपने शरीर और अपने भविष्य के बारे में निर्णय लेने का मौलिक अधिकार है। एक दुष्कर्म पीड़िता को उस आघात के साथ जीने के लिए मजबूर करना उसके गरिमापूर्ण जीवन के अधिकार का उल्लंघन होगा।" कोर्ट ने मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट को भी आधार बनाया, जिसमें पीड़िता के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य को लेकर चिंता जताई गई थी।

अदालत ने संबंधित सरकारी अस्पताल को निर्देश दिया है कि वरिष्ठ डॉक्टरों का एक मेडिकल बोर्ड तुरंत गठित किया जाए और सुरक्षित तरीके से गर्भपात की प्रक्रिया पूरी की जाए। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि भ्रूण जीवित पैदा होता है, तो उसकी देखभाल और भविष्य की जिम्मेदारी राज्य सरकार की होगी। इसके अलावा, डीएनए परीक्षण के लिए भ्रूण के नमूने सुरक्षित रखने के निर्देश दिए गए हैं ताकि मुख्य दुष्कर्म मामले में इसे साक्ष्य (Evidence) के रूप में इस्तेमाल किया जा सके।

यह फैसला 'मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी (MTP) एक्ट' के तहत दी गई सीमाओं और विशेष परिस्थितियों में अदालती हस्तक्षेप की व्याख्या करता है। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि छुट्टियों के दिन सुनवाई करना और पीड़िता के हक में फैसला देना यह दर्शाता है कि कानून की प्रक्रिया मानवीय संवेदनाओं से ऊपर नहीं है। इस फैसले से उन अनगिनत पीड़िताओं को उम्मीद मिली है जो कानूनी देरी के कारण अनचाहे गर्भ को ढोने के लिए मजबूर हो जाती हैं।

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