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Dilapidated School Buildings: दीवारों में गहरी दरारें और जर्जर छतें; नए शैक्षणिक सत्र में भी नहीं सुधरे शासकीय स्कूलों के हालात, कभी भी हो सकता है बड़ा हादसा

School Infrastructure Crisis (खैरागढ़ स्कूल बुनियादी ढांचा संकट): छत्तीसगढ़ में नए शैक्षणिक सत्र (Academic Session) का आगाज बड़े ही उत्साह और दावों के साथ हो चुका है। स्कूलों में बच्चों के स्वागत के लिए घंटियां बज चुकी हैं, लेकिन खैरागढ़-छुईखदान-गंडई (KCG) जिले से एक ऐसी जमीनी और झकझोर देने वाली हकीकत सामने आई है, जिसने शिक्षा विभाग के तमाम दावों और सुशासन की पोल खोलकर रख दी है। जिले के कई अंदरूनी और ग्रामीण अंचलों में संचालित होने वाले शासकीय स्कूलों में आज भी मासूम बच्चों की पढ़ाई सीधे तौर पर 'मौत के साए' में चल रही है। स्थिति इतनी भयावह है कि कई स्कूल भवनों की दीवारों में इतनी गहरी और चौड़ी दरारें आ चुकी हैं कि वे कभी भी ढह सकती हैं, वहीं कई कमरों की छतें पूरी तरह से जर्जर हो चुकी हैं और उनका प्लास्टर भरभराकर नीचे गिर रहा है। जून का महीना आधा बीतने के साथ ही जैसे ही छत्तीसगढ़ में मानसून और मानसूनी बरसात की शुरुआत हुई है, इन जर्जर स्कूल भवनों की बदहाली ने वहां पढ़ने वाले बच्चों के अभिभावकों की चिंता को चरम पर पहुंचा दिया है। अब सबसे बड़ा और सुलगता हुआ सवाल यह खड़ा हो गया है कि देश के भविष्य कहे जाने वाले इन मासूम बच्चों की पढ़ाई आखिर कब तक ऐसे खतरनाक और जानलेवा भवनों के भरोसे चलती रहेगी?

खैरागढ़ जिले के विभिन्न विकासखंडों से मिली मैदानी रिपोर्ट के अनुसार, कई शासकीय प्राथमिक, पूर्व माध्यमिक और हाई स्कूल वर्षों से मरम्मत (Maintenance) और रखरखाव के अभाव में पूरी तरह से खस्ताहाल हो चुके हैं। कुछ स्कूलों की हालत तो इतनी बदतर है कि उन्हें पहली नजर में स्कूल कहना भी मुश्किल है; वे किसी खंडहर की तरह नजर आते हैं। स्थानीय ग्रामीणों का कहना है कि हर साल बरसात के दिनों में स्कूल की छतों से लगातार पानी टपकता है, जिससे कमरों में सीलन और जलजमाव की स्थिति बन जाती है। ऐसे माहौल में बच्चों को नीचे जमीन पर बैठना तो दूर, खड़े रहने में भी डर लगता है। बिजली की अव्यवस्था और ऊपर से जर्जर छतों के गिरने के डर के बीच बच्चे किसी तरह अपनी कक्षाएं पूरी करते हैं। कई बार तो अनहोनी की आशंका के चलते शिक्षक बच्चों को स्कूल भवन के बाहर किसी पेड़ के नीचे या गांव के सामुदायिक भवन में बिठाकर पढ़ाने को मजबूर हो जाते हैं।
अभिभावकों में इस प्रशासनिक उदासीनता को लेकर भारी आक्रोश देखा जा रहा है। उनका कहना है कि वे अपने बच्चों को पढ़ने के लिए स्कूल भेजते हैं, न कि अपनी जान जोखिम में डालने के लिए। बरसात के मौसम में जब कड़कड़ाती बिजली चमकती है और तेज हवाएं चलती हैं, तो घर पर बैठे माता-पिता की धड़कनें सिर्फ इस चिंता में बढ़ी रहती हैं कि कहीं उनके बच्चे के स्कूल की छत या दीवार न गिर जाए। ग्रामीणों का आरोप है कि इस जर्जर बुनियादी ढांचे (Infrastructure) के संबंध में कई बार स्कूल प्रबंधन समितियों द्वारा प्रस्ताव बनाकर विकासखंड शिक्षा अधिकारी (BEO) और जिला शिक्षा अधिकारी (DEO) कार्यालय को भेजा जा चुका है, लेकिन वर्षों बीत जाने के बाद भी बजट की कमी या तकनीकी कागजी कार्रवाई का बहाना बनाकर फाइलों को ठंडे बस्ते में डाल दिया जाता है।
लल्लूराम डॉट कॉम की रिपोर्ट के मुताबिक, खैरागढ़ जिले के नवगठित होने के बाद यह उम्मीद जगी थी कि जिला मुख्यालय के नजदीक होने से इन अंदरूनी क्षेत्रों के सरकारी स्कूलों की दशा सुधरेगी, लेकिन धरातल पर स्थितियां जस की तस बनी हुई हैं। यदि समय रहते शिक्षा विभाग और जिला प्रशासन ने इन बेहद जर्जर हो चुके स्कूल भवनों का तकनीकी ऑडिट कराकर उनकी मरम्मत या नए भवनों का निर्माण शुरू नहीं कराया, तो आने वाले दिनों में किसी बड़े और दर्दनाक हादसे से इनकार नहीं किया जा सकता। फिलहाल, जिले के नौनिहाल हर दिन डर और खौफ के साए में ककहरा सीखने को मजबूर हैं।







