मध्य प्रदेश के देवास जिले में बैंकिंग जगत को हिला देने वाले 'नकली सोना कांड' में विशेष न्यायालय ने अपना महत्वपूर्ण फैसला सुना दिया है। अदालत ने मामले में संलिप्त चार बैंक अधिकारियों को दोषी पाते हुए प्रत्येक को 5-5 वर्ष के सश्रम कारावास की सजा सुनाई है। यह मामला बैंकों में फर्जी तरीके से नकली सोना गिरवी रखकर करोड़ों रुपये का ऋण (Gold Loan) लेने और देने से जुड़ा था। इस फैसले ने साफ कर दिया है कि पद का दुरुपयोग कर वित्तीय अनियमितता करने वाले अधिकारियों को कानून किसी भी सूरत में नहीं बख्शेगा।
यह पूरा घोटाला तब सामने आया था जब बैंक के ऑडिट के दौरान गिरवी रखे गए सोने की शुद्धता पर संदेह हुआ। जांच में पता चला कि अधिकारियों ने मिलीभगत कर शुद्ध सोने के बजाय नकली या कम कैरेट के सोने को असली बताकर लोन स्वीकृत किए थे। इस धोखाधड़ी से बैंक को करोड़ों रुपये का वित्तीय नुकसान उठाना पड़ा था। सजा पाने वाले अधिकारियों में तत्कालीन शाखा प्रबंधक और ऋण विभाग के कर्मचारी शामिल हैं, जिनकी मिलीभगत के बिना इतनी बड़ी वारदात को अंजाम देना संभव नहीं था।
अदालत ने अपने फैसले में टिप्पणी करते हुए कहा कि बैंक अधिकारियों का कृत्य जनता के विश्वास के साथ विश्वासघात है। अभियोजन पक्ष ने सुनवाई के दौरान ठोस दस्तावेजी साक्ष्य और लैब रिपोर्ट पेश की, जिसमें साबित हुआ कि गिरवी रखा गया सोना नकली था। कोर्ट ने सजा के साथ-साथ दोषियों पर भारी अर्थदंड भी लगाया है। जुर्माने की राशि जमा न करने पर उन्हें अतिरिक्त कारावास भुगतना होगा। फैसले के तुरंत बाद पुलिस ने चारों दोषियों को हिरासत में लेकर जेल भेज दिया है।
इस फैसले के बाद बैंकिंग क्षेत्र में हड़कंप मच गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह की सख्त सजा से गोल्ड लोन की प्रक्रियाओं में और अधिक पारदर्शिता और सख्ती आएगी। देवास पुलिस और सीबीआई (CBI) की संयुक्त जांच ने इस सिंडिकेट के हर मोहरे को बेनकाब किया। स्थानीय निवासियों और बैंक ग्राहकों ने इस फैसले का स्वागत किया है, उनका कहना है कि सरकारी पदों पर बैठे भ्रष्ट लोगों के लिए यह एक बड़ा सबक है। फिलहाल, बैंक प्रबंधन अब दोषियों से गबन की गई राशि की वसूली के लिए कानूनी प्रक्रिया शुरू करने की तैयारी में है।



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