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प्रकृति और पारंपरिक ज्ञान का अनूठा संगम: वनौषधियों के संरक्षण के लिए हुआ 'बॉटनाइजेशन', 80 दुर्लभ प्रजातियों की हुई लाइव पहचान

कसडोल। छत्तीसगढ़ के कसडोल अंतर्गत देवपुर वन परिक्षेत्र में शनिवार को प्रकृति, विज्ञान और पारंपरिक ज्ञान के अद्भुत संगम की एक बेहद खूबसूरत व ऐतिहासिक तस्वीर देखने को मिली। वनांचल क्षेत्र देवपुर में औषधीय वनस्पतियों (जड़ी-बूटियों) के महत्व, संरक्षण और उनकी सटीक पहचान पर केंद्रित एक दिवसीय विशेष 'बॉटनाइजेशन' (Botanization) कार्यशाला का भव्य आयोजन किया गया। इस अनूठी कार्यशाला का प्राथमिक उद्देश्य हमारे घने जंगलों में छिपे अमूल्य औषधीय खजाने को गहराई से पहचानना, उनका आधुनिक वैज्ञानिक वर्गीकरण करना और सदियों से चले आ रहे उनके पारंपरिक वैदकीय गुणों को भविष्य की पीढ़ियों के लिए सुरक्षित सहेजना था।

इस कार्यशाला की सबसे बड़ी खासियत यह रही कि इसमें पीढ़ी-दर-पीढ़ी जंगलों के बीच रहकर जड़ी-बूटियों का गुप्त ज्ञान रखने वाले अंचल के पारंपरिक नाड़ी वैद्यों, जड़ी-बूटी जानकारों और आधुनिक वनस्पति शास्त्र के प्रख्यात वैज्ञानिकों व वन विभाग के विशेषज्ञों ने एक साथ हिस्सा लिया। विशेषज्ञों की टीम ने देवपुर के जंगलों का भ्रमण कर लाइव फील्ड विजिट के दौरान लगभग 80 से अधिक दुर्लभ और अत्यंत महत्वपूर्ण औषधीय पौधों व जड़ी-बूटियों की मौके पर ही 'लाइव पहचान' (Live Identification) की। इन पौधों के वैज्ञानिक नाम, कुल (Family) और उनके औषधीय उपयोगों का एक विस्तृत डेटाबेस तैयार किया गया।
कार्यशाला में उपस्थित वनस्पति विज्ञानियों ने बताया कि छत्तीसगढ़ के वनांचल औषधीय पौधों के मामले में बेहद समृद्ध हैं, लेकिन आधुनिकता और उचित दस्तावेजीकरण (Documentation) न होने के कारण हमारा यह पारंपरिक ज्ञान धीरे-धीरे विलुप्त होने की कगार पर पहुंच रहा है। ऐसे में यह 'बॉटनाइजेशन' अभियान वैद्यों के व्यावहारिक ज्ञान और आधुनिक विज्ञान के बीच एक मजबूत पुल का काम करेगा। कार्यशाला के दौरान वैद्यों द्वारा असाध्य बीमारियों के इलाज में उपयोग की जाने वाली पत्तियों, छालों और जड़ों के चमत्कारी गुणों को वैज्ञानिक कसौटी पर परखने और उनके पेटेंट व व्यावसायिक स्तर पर संरक्षण को लेकर भी विस्तृत रूपरेखा तैयार की गई। वन विभाग के अधिकारियों ने इस पहल को वनों के संरक्षण और स्थानीय स्तर पर रोजगार सृजन के लिए एक बड़ा कदम बताया है।







