कांग्रेस इस बार केवल 'वोट काटने' के लिए नहीं, बल्कि अपनी स्वतंत्र राजनीतिक पहचान बहाल करने के लिए उतर रही है। पार्टी के संभावित एजेंडे इस प्रकार हैं:
स्वतंत्र पहचान की बहाली: पश्चिम बंगाल में लंबे समय से कांग्रेस या तो लेफ्ट या टीएमसी के पीछे रही है। कार्यकर्ताओं का मानना है कि गठबंधन के कारण पार्टी का आधार खत्म हो रहा है। इसलिए, 'अपनी जमीन, अपना झंडा' मुख्य नारा होगा।
टीएमसी का 'भ्रष्टाचार' और 'हिंसा': कांग्रेस नेतृत्व ममता सरकार के दौरान हुए कथित भ्रष्टाचार के मामलों और चुनावी हिंसा को प्रमुखता से उठाएगी। अधीर रंजन चौधरी जैसे नेता पहले भी टीएमसी पर 'लोकतंत्र की हत्या' का आरोप लगाते रहे हैं।
विकास का 'तीसरा विकल्प': बीजेपी की 'ध्रुवीकरण की राजनीति' और टीएमसी के 'तुष्टीकरण' के आरोपों के बीच कांग्रेस खुद को एक धर्मनिरपेक्ष और विकासोन्मुखी तीसरे विकल्प के रूप में पेश करेगी।
प्रवासी मजदूरों और युवाओं का मुद्दा: राज्य में बेरोजगारी और बंगाल से बाहर पलायन कर रहे मजदूरों की सुरक्षा कांग्रेस के एजेंडे में शीर्ष पर रहेगी।
INDIA ब्लॉक से अलग स्थानीय संघर्ष: राष्ट्रीय स्तर पर INDIA गठबंधन का हिस्सा होने के बावजूद, बंगाल में कांग्रेस ममता बनर्जी को चुनौती देगी। पार्टी का तर्क है कि राज्य में विपक्ष की भूमिका निभाना उसकी मजबूरी और जरूरत दोनों है।
क्यों लिया यह फैसला?
कार्यकर्ताओं का दबाव: बंगाल कांग्रेस के नेताओं का कहना है कि टीएमसी के साथ रहने से उनके कैडर को नुकसान हो रहा है क्योंकि टीएमसी के लोग ही जमीन पर कांग्रेसियों के साथ संघर्ष करते हैं।
ममता बनर्जी का कड़ा रुख: टीएमसी ने पहले ही साफ कर दिया था कि वह अकेले चुनाव लड़ेगी, जिसके बाद कांग्रेस के पास भी अकेले जाने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा था।
लेफ्ट से भी दूरी: इस बार कांग्रेस ने वामपंथी दलों के साथ भी गठबंधन नहीं करने का संकेत दिया है, जो पिछले कई चुनावों से साथ थे।








