छत्तीसगढ़ की राजनीति में 'समान नागरिक संहिता' (UCC) के संभावित ऐलान ने हलचल मचा दी है। प्रदेश में इस विषय पर छिड़ी बहस ने भाजपा और कांग्रेस के बीच एक नया टकराव पैदा कर दिया है। जहाँ सत्ताधारी भाजपा सरकार इसे राष्ट्रीय एकता और एकसमान कानून व्यवस्था की दिशा में एक जरूरी कदम मान रही है, वहीं मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस ने इसे आदिवासी संस्कृति और संवैधानिक अधिकारों के साथ खिलवाड़ करार दिया है। राज्य भर में इस मुद्दे पर हो रही बयानबाजी से सियासी पारा चरम पर है।
इस विवाद का सबसे संवेदनशील पहलू आदिवासी समाज के अधिकार हैं। राज्य के आदिवासी नेताओं और विपक्षी दलों का तर्क है कि छत्तीसगढ़ की जनजातीय परंपराएं, उनकी रूढ़ियां और सामाजिक ढांचा मुख्यधारा से भिन्न और विशिष्ट हैं। उन्हें डर है कि यदि UCC लागू होता है, तो उनकी प्रथागत कानूनों (Customary Laws) की सुरक्षा खतरे में पड़ सकती है। कांग्रेस ने भाजपा पर आरोप लगाया है कि वह ध्रुवीकरण की राजनीति के लिए आदिवासियों के विशिष्ट अधिकारों को नजरअंदाज कर रही है, जबकि भाजपा इन आशंकाओं को निराधार बताते हुए उन्हें 'भ्रम' करार दे रही है।
सियासी गलियारों में इस बात की चर्चा जोरों पर है कि छत्तीसगढ़ सरकार उत्तराखंड में लागू किए गए UCC मॉडल का गहन अध्ययन कर सकती है। उत्तराखंड मॉडल में दी गई छूट और प्रावधानों को एक बेंचमार्क की तरह देखा जा रहा है, और अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि क्या छत्तीसगढ़ सरकार इसे हूबहू लागू करेगी या स्थानीय जरूरतों के अनुसार इसमें बदलाव किए जाएंगे। जैसे-जैसे राज्य में इस पर बहस तेज हो रही है, यह मुद्दा आने वाले समय में एक बड़ा जन-आंदोलन या नीतिगत पहेली बन सकता है।








