रायपुर: राष्ट्रीय बालिका दिवस के मौके पर छत्तीसगढ़ के लिए दोहरी खुशी की खबर है। ताज़ा आंकड़ों के अनुसार, छत्तीसगढ़ अब जन्म के समय लिंगानुपात (SRB) के मामले में देश का अव्वल राज्य बन गया है। प्रदेश में प्रति 1000 बालकों पर जन्म लेने वाली बालिकाओं की संख्या 974 तक पहुँच गई है। यह आंकड़ा न केवल राष्ट्रीय औसत (929) से काफी अधिक है, बल्कि इसने पारंपरिक रूप से बेहतर माने जाने वाले राज्यों जैसे केरल (971) और हिमाचल प्रदेश (958) को भी पीछे छोड़ दिया है।
बदल रही है समाज की सोच: उत्सव बना बेटियों का जन्म
एक समय था जब छत्तीसगढ़ के कई अंचलों में भी बेटे-बेटी के बीच फर्क देखा जाता था, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में सरकार की योजनाओं और सामाजिक जागरूकता ने तस्वीर बदल दी है:
सख्त कानून: पीसीपीएनडीटी (PCPNDT) एक्ट के कड़े क्रियान्वयन से कन्या भ्रूण हत्या पर प्रभावी रोक लगी है।
सरकारी योजनाएं: 'बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ' और 'महतारी वंदन' जैसी योजनाओं ने बेटियों के प्रति आर्थिक और सामाजिक नजरिया बदला है।
सामाजिक चेतना: ग्रामीण अंचलों में अब बेटियों के जन्म पर 'सोहर' गाए जाते हैं और मिठाइयां बांटी जाती हैं।
प्रमुख राज्यों का तुलनात्मक लिंगानुपात (SRB):
राज्य लिंगानुपात (प्रति 1000 बालक)
छत्तीसगढ़ 974
केरल 971
हिमाचल प्रदेश 958
आंध्र प्रदेश 943
राष्ट्रीय औसत 929
स्वास्थ्य और शिक्षा में भी अग्रणी
मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने इस उपलब्धि पर प्रदेशवासियों को बधाई देते हुए कहा कि यह छत्तीसगढ़ की जागरूक जनता और प्रशासन की मेहनत का फल है। उन्होंने कहा कि प्रदेश की बेटियां आज शिक्षा, खेल और सुरक्षा बलों में भी उत्कृष्ट प्रदर्शन कर रही हैं। स्वास्थ्य विभाग के अनुसार, संस्थागत प्रसव (Institutional Delivery) में वृद्धि और पोषण कार्यक्रमों ने भी बालिकाओं की जीवित दर को बेहतर बनाया है।
बस्तर की बेटियों का दम
विशेष रूप से बस्तर और सरगुजा जैसे जनजातीय क्षेत्रों में लिंगानुपात हमेशा से बेहतर रहा है, लेकिन अब शहरी क्षेत्रों (रायपुर, दुर्ग-भिलाई) में भी यह ग्राफ तेजी से ऊपर चढ़ा है, जो समाज की आधुनिक और संवेदनशील सोच को दर्शाता है।








