रायपुर: छत्तीसगढ़ कांग्रेस के दो कद्दावर स्तंभों—पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल और पूर्व उपमुख्यमंत्री टी.एस. सिंहदेव—के बीच के रिश्तों में जमी बर्फ पिघलने का नाम नहीं ले रही है। हालिया राजनीतिक गतिविधियों और बयानबाजी ने एक बार फिर यह स्पष्ट कर दिया है कि सत्ता परिवर्तन के बाद भी दोनों दिग्गजों के बीच 'कोल्ड वॉर' बदस्तूर जारी है। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि यह खींचतान आने वाले समय में संगठन की मजबूती को प्रभावित कर सकती है।
विवाद की जड़ें साल 2018 में हुए सत्ता संघर्ष से जुड़ी हैं, जब 'ढाई-ढाई साल' के मुख्यमंत्री पद के कथित समझौते को लेकर दोनों नेताओं के बीच दरार आई थी। हालांकि, पिछले विधानसभा चुनाव से ठीक पहले आलाकमान ने टी.एस. सिंहदेव को उपमुख्यमंत्री बनाकर स्थिति संभालने की कोशिश की थी, लेकिन हाल के घटनाक्रम बताते हैं कि दोनों गुटों के बीच जमीनी स्तर पर सामंजस्य अब भी एक बड़ी चुनौती बना हुआ है।
हाल ही में हुए सांगठनिक कार्यक्रमों और सोशल मीडिया पर समर्थकों की बयानबाजी ने इस आग में घी डालने का काम किया है। जहाँ एक ओर बघेल खेमा अपनी आक्रामक शैली और 'छत्तीसगढ़ियावाद' के दम पर अपनी पकड़ मजबूत बनाए रखना चाहता है, वहीं 'बाबा' (सिंहदेव) के समर्थक उनके अनुभव और सरगुजा क्षेत्र में उनके निर्विवाद प्रभाव को दरकिनार किए जाने से असंतुष्ट नजर आते हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बीजेपी की सक्रियता और आगामी चुनौतियों को देखते हुए कांग्रेस के लिए इन दोनों नेताओं का एक मंच पर आना अनिवार्य है। यदि यह 'शीतयुद्ध' इसी तरह जारी रहा, तो कार्यकर्ताओं में भ्रम की स्थिति पैदा होगी। फिलहाल, दिल्ली दरबार (हाईकमान) की ओर से इस मामले में कोई कड़ी प्रतिक्रिया नहीं आई है, लेकिन अंदरूनी सूत्रों का कहना है कि दोनों नेताओं को एकजुट रहने की सख्त हिदायत दी जा चुकी है।
अब देखना यह होगा कि क्या ये दोनों दिग्गज नेता निजी मतभेदों को भुलाकर पार्टी हित में एक साथ खड़े होते हैं, या फिर यह 'कोल्ड वॉर' छत्तीसगढ़ कांग्रेस के लिए एक नई राजनीतिक अस्थिरता का सबब बनेगा।








