रायपुर (छत्तीसगढ़): छत्तीसगढ़ का सरकारी ढांचा वर्तमान में एक बड़े विरोधाभास से गुजर रहा है। राज्य के विभिन्न विभागों में लगभग 7 लाख अनियमित, संविदा और आउटसोर्स कर्मचारी कार्यरत हैं, जिनके कंधों पर सरकारी कामकाज का बड़ा हिस्सा टिका हुआ है। चुनावी वादों और दावों के बीच, इन कर्मचारियों के नियमितीकरण (Regularisation) का मुद्दा अब एक बड़ी राजनीतिक जंग का रूप ले चुका है। जहाँ कर्मचारी संगठन 'मोदी की गारंटी' और पुराने घोषणापत्रों को याद दिला रहे हैं, वहीं सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच आरोप-प्रत्यारोप का दौर जारी है।
आंकड़ों के अनुसार, राज्य में 1 लाख से अधिक कर्मचारी केवल आउटसोर्सिंग के माध्यम से काम कर रहे हैं, जिनमें ऊर्जा विभाग, नगरीय प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्र शामिल हैं। इन कर्मचारियों का आरोप है कि वर्षों की सेवा के बाद भी उन्हें न तो उचित वेतन मिल रहा है और न ही भविष्य की सुरक्षा। 'छत्तीसगढ़ प्रगतिशील अनियमित कर्मचारी फेडरेशन' के नेतृत्व में कर्मचारी अब लामबंद हो रहे हैं। उनका तर्क है कि यदि सरकार उनके वेतन में मामूली बढ़ोतरी कर उन्हें नियमित पदों पर समायोजित करे, तो बजट पर बहुत अधिक बोझ नहीं पड़ेगा।
इस मुद्दे पर राजनीति तब और तेज हो गई जब विपक्षी दल कांग्रेस ने सरकार पर वादाखिलाफी का आरोप लगाया। कांग्रेस का कहना है कि सरकार कर्मचारियों को केवल समितियों के जाल में उलझा रही है। वहीं, सत्ताधारी भाजपा का तर्क है कि पिछली सरकार ने जो 'अनियमितता' का बोझ छोड़ा था, उसे व्यवस्थित करने के लिए समय और नीतिगत ढांचे की आवश्यकता है। हाल ही में हाईकोर्ट के कुछ फैसलों ने भी 10 साल से अधिक सेवा देने वाले कर्मचारियों के हक में सकारात्मक संकेत दिए हैं, जिससे कर्मचारियों की उम्मीदें और बढ़ गई हैं।
बस्तर से लेकर सरगुजा तक, इन 7 लाख परिवारों का भविष्य इस एक फैसले पर टिका है। कर्मचारी संगठनों ने चेतावनी दी है कि यदि जल्द ही ठोस नीति नहीं बनाई गई, तो वे एक बार फिर 'कलम बंद, काम बंद' जैसे बड़े आंदोलन की ओर रुख करेंगे। फिलहाल, राजधानी रायपुर में बैठकों और प्रदर्शनों का दौर जारी है, जिससे सरकारी कामकाज प्रभावित होने की आशंका बनी हुई है।








