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धर्मांतरण पर साय सरकार का सर्जिकल स्ट्राइक: बजट सत्र में आएगा नया विधेयक, दोषियों को होगी 10 साल तक की जेल

Chhattisgarh RRT News Desk 15 March 2026

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रायपुर: छत्तीसगढ़ की विष्णुदेव साय सरकार ने राज्य में अवैध और जबरन धर्मांतरण की गतिविधियों पर नकेल कसने के लिए निर्णायक कदम उठा लिया है। कैबिनेट ने 'छत्तीसगढ़ धर्म स्वातंत्र्य विधेयक 2026' के प्रारूप को मंजूरी दे दी है, जिसे वर्तमान बजट सत्र में पेश किया जाएगा। इस नए कानून का मुख्य उद्देश्य प्रलोभन, बल प्रयोग, कपट या धोखे से कराए जाने वाले मतांतरण को प्रभावी ढंग से रोकना है। सरकार ने स्पष्ट किया है कि प्रदेश की सांस्कृतिक पहचान और विशेष रूप से आदिवासी अंचलों की अस्मिता की रक्षा के लिए यह सख्त कानून अनिवार्य हो गया था।

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प्रस्तावित विधेयक के प्रावधानों के अनुसार, अब धर्मांतरण कराने वालों के लिए सजा और जुर्माने का दायरा काफी बढ़ा दिया गया है। सामान्य मामलों में जबरन धर्मांतरण पर 7 से 10 साल तक की जेल और न्यूनतम 5 लाख रुपये के जुर्माने का प्रस्ताव है। वहीं, यदि पीड़ित महिला, नाबालिग या अनुसूचित जाति (SC)/अनुसूचित जनजाति (ST) वर्ग से है, तो सजा की अवधि 10 से 20 साल तक हो सकती है। सामूहिक धर्मांतरण के मामलों में तो और भी कठोर रुख अपनाते हुए 10 साल से लेकर आजीवन कारावास और 25 लाख रुपये तक के जुर्माने का प्रावधान रखा गया है।

इस कानून की सबसे बड़ी विशेषता इसकी प्रक्रियात्मक सख्ती है। नए नियमों के मुताबिक, स्वेच्छा से धर्म परिवर्तन करने वाले व्यक्ति को भी कम से कम 60 दिन पूर्व जिला प्रशासन को सूचना देनी होगी। यदि कोई इस नियम का उल्लंघन करता है, तो उस धर्मांतरण को अवैध माना जाएगा। इसके अतिरिक्त, विधेयक में 'चंगाई सभाओं' (Faith Healing) के माध्यम से किए जाने वाले गुमराहपूर्ण प्रचार को भी कानूनी दायरे में लाने की तैयारी है। उप-मुख्यमंत्री विजय शर्मा ने संकेत दिया है कि इन सभाओं के जरिए होने वाले अवांछित प्रभाव को रोकने के लिए विशेष तंत्र बनाया जाएगा।

विधेयक के ड्राफ्ट में यह भी स्पष्ट किया गया है कि यदि कोई व्यक्ति अपने 'पैतृक धर्म' में वापस लौटता है (घर वापसी), तो उसे धर्मांतरण की श्रेणी में नहीं रखा जाएगा। सरकार का तर्क है कि 1968 के मौजूदा कानून में कई खामियां थीं, जिनका लाभ उठाकर असामाजिक तत्व भोले-भाले लोगों का मतांतरण कर रहे थे। विपक्षी दलों द्वारा उठाए जा रहे सवालों के बीच, सरकार ने साफ कर दिया है कि यह कानून किसी धर्म विशेष के खिलाफ नहीं, बल्कि 'जबरन और अनैतिक' तरीके के खिलाफ है। इसे बस्तर, सरगुजा और जशपुर जैसे संवेदनशील जिलों में बढ़ते तनाव को कम करने की दिशा में एक बड़ा बदलाव माना जा रहा है।

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