रायपुर: छत्तीसगढ़ में सरकारी कर्मचारी और अधिकारियों की तीन दिवसीय राज्यव्यापी हड़ताल (29 से 31 दिसंबर 2025) के कारण पूरे प्रदेश में प्रशासनिक व्यवस्था चरमरा गई है। छत्तीसगढ़ अधिकारी-कर्मचारी फेडरेशन के बैनर तले आयोजित इस 'कलम बंद, काम बंद' आंदोलन के कारण तहसीलों से लेकर संचालनालय (इंद्रावती भवन) तक सन्नाटा पसरा हुआ है। सबसे गंभीर असर स्वास्थ्य सेवाओं पर पड़ा है, जहाँ डॉक्टरों के समर्थन के बाद ओपीडी (OPD) सेवाएं पूरी तरह बंद कर दी गई हैं।
प्रमुख मांगें और 'मोदी की गारंटी' का हवाला
फेडरेशन के नेताओं का कहना है कि यह आंदोलन सरकार को उनके चुनावी वादे याद दिलाने के लिए है। उनकी प्रमुख मांगों में शामिल हैं:
महंगाई भत्ता (DA): केंद्र के समान देय तिथि से एरियर्स सहित महंगाई भत्ता प्रदान करना।
पिंगुआ कमेटी की रिपोर्ट: वेतन विसंगतियों को दूर करने के लिए बनाई गई पिंगुआ कमेटी की रिपोर्ट को सार्वजनिक करना।
नियमितीकरण: अनियमित, संविदा और दैनिक वेतन भोगी कर्मचारियों का नियमितीकरण।
पेंशन और सेवा लाभ: प्रथम नियुक्ति तिथि से सेवा लाभ की गणना और सेवानिवृत्ति आयु को बढ़ाना।
अस्पतालों में स्वास्थ्य सेवाएं प्रभावित
आंदोलन का सबसे ज्यादा असर आम जनता पर स्वास्थ्य सेवाओं के रूप में पड़ रहा है। छत्तीसगढ़ इन-सर्विस डॉक्टर्स एसोसिएशन (CIDA) द्वारा हड़ताल को समर्थन देने के बाद जिला अस्पतालों, सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों (CHC) और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों (PHC) में ओपीडी सेवाएं ठप हैं। केवल आपातकालीन सेवाएं और लेबर रूम ही संचालित हो रहे हैं। दूर-दराज से आए मरीजों को बिना इलाज के वापस लौटना पड़ रहा है।
प्रशासनिक कार्य ठप, जनता परेशान
राजस्व, पंचायत, शिक्षा और महिला बाल विकास जैसे 54 से अधिक विभागों के लगभग 4.5 लाख कर्मचारी इस हड़ताल में शामिल हैं। रजिस्ट्री कार्यालयों, नगर निगमों और कलेक्टोरेट में आवेदन लंबित पड़े हैं। फेडरेशन ने चेतावनी दी है कि यदि 31 दिसंबर तक उनकी 11 सूत्रीय मांगों पर कोई ठोस निर्णय नहीं लिया गया, तो नए साल में अनिश्चितकालीन आंदोलन की रणनीति तैयार की जाएगी।








