छत्तीसगढ़ में सत्ता परिवर्तन के बाद से ही नगरीय निकायों में एल्डरमैन की नियुक्ति को लेकर कयास लगाए जा रहे थे, लेकिन अब यह मामला लंबा खिंचता नजर आ रहा है। प्रदेश के 10 नगर निगमों, 49 नगर पालिकाओं और 114 नगर पंचायतों में कुल 667 एल्डरमैन नियुक्त किए जाने हैं। नियमतः ये वे मनोनीत सदस्य होते हैं जिन्हें प्रशासन और समाज सेवा का अनुभव होता है, लेकिन व्यावहारिक रूप से ये पद सत्ताधारी दल के सक्रिय कार्यकर्ताओं को 'एडजस्ट' करने का सबसे बड़ा जरिया होते हैं। करीब एक साल से ज्यादा समय से ये नियुक्तियां लंबित हैं, जिसके कारण अब भाजपा के स्थानीय कार्यकर्ताओं में असंतोष की सुगबुगाहट देखी जा रही है।
क्यों अटकी है नियुक्ति?
सूत्रों के अनुसार, नियुक्ति में देरी के पीछे मुख्य कारण निकाय चुनाव 2025 की नई रणनीतियां और संगठन के भीतर नामों पर चल रही खींचतान है। फरवरी 2025 में हुए नगरीय निकाय चुनावों के बाद, जहाँ भाजपा ने शानदार प्रदर्शन करते हुए रायपुर सहित अधिकांश निगमों पर कब्जा जमाया, पार्टी अब उन्हीं कार्यकर्ताओं को तवज्जो देना चाहती है जिन्होंने जमीनी स्तर पर जीत दिलाने में मेहनत की। हालांकि, हर वार्ड और शहर से नामों की लंबी फेहरिस्त होने के कारण अंतिम सूची पर मुहर नहीं लग पा रही है।
एल्डरमैन की भूमिका और महत्व
वोटिंग का अधिकार: एल्डरमैन नगर निगम और निकायों की बैठकों में शामिल होते हैं और चर्चा में भाग लेते हैं। हालांकि, उन्हें सामान्य सभा की वोटिंग में हिस्सा लेने का अधिकार नहीं होता, लेकिन समितियों में उनकी भूमिका महत्वपूर्ण होती है।
विकास कार्यों में दखल: सत्ता पक्ष के एल्डरमैन होने से निकायों में सरकार की पकड़ मजबूत होती है और पार्षदों के साथ मिलकर वे विकास कार्यों की निगरानी करते हैं।
राजनीतिक पुरस्कार: यह पद उन कार्यकर्ताओं के लिए पुरस्कार की तरह होता है जो चुनाव नहीं लड़ पाते या जीत नहीं पाते, लेकिन संगठन के लिए समर्पित रहते हैं।
विपक्ष (कांग्रेस) इस देरी को लेकर सरकार पर निशाना साध रहा है। कांग्रेस का आरोप है कि सरकार आंतरिक गुटबाजी के कारण निर्णय नहीं ले पा रही है, जिससे निकायों के कामकाज पर असर पड़ रहा है। वहीं, भाजपा संगठन का कहना है कि नियुक्तियां जल्द ही की जाएंगी और इसके लिए योग्य व समर्पित कार्यकर्ताओं का चयन प्रक्रियाधीन है। फिलहाल, 667 पदों के लिए हजारों दावेदार अपनी किस्मत के भरोसे बैठे हैं।








