CG News : बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने राजनांदगांव जिले के डोंगरगांव क्षेत्र से जुड़े 21 साल पुराने दुष्कर्म के एक मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। कोर्ट ने मामले के आरोपी मूलचंद को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया है। न्यायमूर्ति नरेंद्र कुमार व्यास की एकलपीठ ने ट्रायल कोर्ट द्वारा दी गई 7 साल की सजा के फैसले को रद्द करते हुए स्पष्ट किया कि अभियोजन पक्ष आरोपी के खिलाफ दोष सिद्ध करने में पूरी तरह विफल रहा है।
क्यों बरी हुआ आरोपी? कोर्ट की मुख्य टिप्पणियां
न्यायालय ने मामले की समीक्षा के दौरान कई ऐसी खामियां पाईं, जिन्होंने अभियोजन के दावों को कमजोर कर दिया। कोर्ट ने पाया कि पीड़िता की गवाही पूरी तरह विश्वसनीय की नहीं थी। बयानों में कई गंभीर विरोधाभास मौजूद थे।
सहमति या मजबूरी?
सुनवाई के दौरान यह तथ्य सामने आया कि घटना के बाद भी दोनों साथ रहे थे। पीड़िता ने स्वयं स्वीकार किया था कि यदि आरोपी उसे अपना लेता, तो वह रिपोर्ट दर्ज नहीं कराती। इस बयान ने मामले को संदिग्ध बना दिया। घटना स्थल एक घनी बस्ती में था, फिर भी किसी को शोर सुनाई नहीं दिया। इसके अलावा, FIR दर्ज कराने में 8 दिनों की देरी हुई, जिसका उचित कारण नहीं बताया गया। सबसे महत्वपूर्ण बात यह रही कि मेडिकल जांच और FSL रिपोर्ट में दुष्कर्म की पुष्टि नहीं हुई थी।
बयान सुसंगत होना अनिवार्य
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में एक महत्वपूर्ण कानूनी सिद्धांत को दोहराते हुए कहा, यद्यपि दुष्कर्म जैसे संवेदनशील मामलों में पीड़िता की अकेली गवाही दोषसिद्धि के लिए पर्याप्त आधार हो सकती है, लेकिन इसके लिए शर्त यह है कि बयान पूरी तरह विश्वसनीय, सुसंगत और हर तरह के संदेह से परे होने चाहिए। इस प्रकरण में इन तत्वों का पूर्णतः अभाव था।
यह मामला साल 2003 का है, जिसमें निचली अदालत ने आरोपी मूलचंद को दोषी करार देते हुए 7 साल के कारावास की सजा सुनाई थी। आरोपी ने इस फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी, जहां 21 साल बाद उसे न्याय मिला और वह सभी आरोपों से दोषमुक्त कर दिया गया।








