Breaking

CG NEWS : क्या घरेलू झगड़ा आत्महत्या का उकसावा है? छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट के इस फैसले ने साफ की कानून की तस्वीर

Chhattisgarh RRT News Desk 15 February 2026 (34)

post

CG NEWS : बिलासपुर। वैवाहिक जीवन में होने वाले आपसी विवादों और आत्महत्या के मामलों को लेकर छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने एक बेहद महत्वपूर्ण और नजीर बनने वाला फैसला सुनाया है। कोर्ट ने कहा है कि पति-पत्नी के बीच होने वाली सामान्य अनबन को धारा 306 (आत्महत्या के लिए उकसाना) के तहत अपराध नहीं माना जा सकता।

Advertisement


इस टिप्पणी के साथ ही न्यायमूर्ति रजनी दुबे की बेंच ने जांजगीर-चांपा के एक व्यक्ति को 17 साल पुराने मामले में बरी करते हुए उसकी सजा को रद्द कर दिया है।


सजा से बरी होने तक का सफर


 मामला 2007 का है, जहाँ एक महिला की शादी के 4 साल बाद मौत हो गई थी। पति पर मानसिक और शारीरिक प्रताड़ना देकर पत्नी को आत्महत्या के लिए मजबूर करने का आरोप लगा। जांजगीर की ट्रायल कोर्ट ने पति को दोषी मानते हुए 4 साल की कड़ी सजा सुनाई थी।



हाई कोर्ट ने इस मामले की गहराई से समीक्षा की और पाया कि केवल आरोपों के आधार पर किसी को अपराधी नहीं ठहराया जा सकता। फैसले के 3 मुख्य आधार रहे:


1. मेडिकल रिपोर्ट में पेच: पोस्टमार्टम में मौत का कारण स्पष्ट नहीं था। डॉक्टर ने माना कि मौत बीमारी (उल्टी-दस्त) से भी हो सकती है।

2. सबूतों की कमी: मामले में महत्वपूर्ण FSL रिपोर्ट पेश नहीं की गई, जिससे जहर या अन्य कारणों की पुष्टि हो सके।

3. कानूनी व्याख्या: कोर्ट ने स्पष्ट किया कि 'उकसाने' का मतलब है। ऐसी स्थिति पैदा करना कि व्यक्ति के पास मरने के अलावा कोई चारा न बचे। सामान्य झगड़े इस श्रेणी में नहीं आते।


अदालत ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि धारा 306 के तहत सजा देने के लिए आपराधिक मंशा (Mens Rea) का होना जरूरी है। बिना ठोस प्रमाण के कि पति ने ही पत्नी को मरने के लिए प्रेरित किया, उसे सजा देना न्यायसंगत नहीं है।


यह फैसला उन मामलों में एक बड़ी राहत है जहाँ घरेलू कलह को बिना ठोस सबूत के सीधे 'उकसावे' का मामला बना दिया जाता है। कोर्ट ने साफ कर दिया है कि कानून भावनाओं पर नहीं, बल्कि प्रत्यक्ष साक्ष्यों और तथ्यों पर काम करता है।

You might also like!