छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण कानूनी व्यवस्था देते हुए कहा है कि बिना अनुमति के स्कूल परिसर में प्रवेश करना भारतीय दंड संहिता की धारा 448 (अनाधिकार गृह अतिचार) के तहत दंडनीय अपराध है। जस्टिस रमेश सिन्हा की डिवीजन बेंच ने स्पष्ट किया कि स्कूल एक ऐसी जगह है जहाँ बच्चों की सुरक्षा और अनुशासन सर्वोपरि है, और इसे निजी घर की तरह ही संरक्षित माना जाना चाहिए। कोर्ट ने कहा कि शैक्षणिक संस्थानों में बाहरी व्यक्तियों का बिना अनुमति प्रवेश न केवल अनुशासन बिगाड़ता है, बल्कि सुरक्षा के लिए भी खतरा पैदा करता है।
यह फैसला पूर्व कांग्रेस प्रवक्ता विकास तिवारी की उस याचिका को खारिज करते हुए आया, जिसमें उन्होंने अपने खिलाफ दर्ज एफआईआर को रद्द करने की मांग की थी। मामला रायपुर के एक स्कूल का है, जहाँ विकास तिवारी पर आरोप था कि वे बिना प्राचार्य की अनुमति के स्कूल के भीतर दाखिल हुए और वहां के कामकाज में व्यवधान उत्पन्न किया। पुलिस ने उनके खिलाफ धारा 448 और अन्य संबंधित धाराओं के तहत मामला दर्ज किया था, जिसे तिवारी ने हाई कोर्ट में चुनौती दी थी।
हाई कोर्ट ने याचिका पर सुनवाई करते हुए कड़ा रुख अपनाया और कहा कि स्कूल कोई ऐसी जगह नहीं है जहाँ "राइट टू एंट्री" का दावा किया जा सके। यदि कोई व्यक्ति, चाहे वह किसी भी पद पर हो, बिना किसी वैध कारण या अनुमति के स्कूल की सीमा लांघता है, तो उसे 'हाउस ट्रेसपास' (House Trespass) माना जाएगा। कोर्ट ने यह भी जोड़ा कि शैक्षणिक संस्थानों की स्वायत्तता और वहां के वातावरण की रक्षा करना कानून की जिम्मेदारी है।
इस फैसले के बाद अब स्कूलों में राजनीतिक या बाहरी हस्तक्षेप करने वालों के लिए सख्त संदेश गया है। शिक्षाविदों और स्कूल प्रबंधन समितियों ने इस निर्णय का स्वागत किया है, उनका मानना है कि इससे स्कूलों में बाहरी तत्वों के अनावश्यक हस्तक्षेप पर लगाम लगेगी। विकास तिवारी की याचिका खारिज होने के बाद अब उन पर निचली अदालत में मुकदमा जारी रहेगा। यह निर्णय भविष्य में शैक्षणिक संस्थानों की सुरक्षा से जुड़े मामलों के लिए एक नजीर (Precedent) साबित होगा।








