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पति के अवैध संबंधों के कारण पत्नी की खुदकुशी उकसाना नहीं: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का बड़ा फैसला...

Chhattisgarh RRT News Desk 06 January 2026

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छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने वैवाहिक विवादों और आत्महत्या के मामलों में एक महत्वपूर्ण कानूनी मिसाल कायम की है। अदालत ने एक याचिका पर सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया कि यदि कोई पत्नी अपने पति के अवैध संबंधों (Illicit Relationship) से परेशान होकर आत्महत्या करती है, तो इसे केवल इस आधार पर भारतीय दंड संहिता की धारा 306 (आत्महत्या के लिए उकसाना) के तहत अपराध नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने कहा कि 'उकसाने' के लिए आरोपी की ओर से कोई सक्रिय कार्य या प्रत्यक्ष मंशा होनी अनिवार्य है।

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मामले की सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति की पीठ ने पाया कि मृतिका के पति के अन्य महिला के साथ संबंध थे, जिससे दुखी होकर उसने आत्मघाती कदम उठाया। हालांकि, अदालत ने दलील दी कि पति का किसी अन्य महिला के साथ संबंध होना नैतिक रूप से गलत हो सकता है और यह क्रूरता (धारा 498A) के दायरे में आ सकता है, लेकिन इसे तब तक 'उकसाना' नहीं कहा जा सकता जब तक कि पति ने पत्नी को खुदकुशी के लिए मजबूर करने वाली कोई ठोस परिस्थिति पैदा न की हो।

हाईकोर्ट ने अपने आदेश में सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि आत्महत्या के मामलों में 'मेनसरिया' (अपराधिक मंशा) का होना जरूरी है। कोर्ट ने यह भी कहा कि हर व्यक्ति की मानसिक सहनशक्ति अलग होती है। यदि कोई व्यक्ति संवेदनशील है और जीवनसाथी के व्यवहार से दुखी होकर ऐसा कदम उठाता है, तो उसके लिए जीवनसाथी को सीधे तौर पर आत्महत्या के लिए जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता, जब तक कि वह उसे ऐसा करने के लिए लगातार प्रेरित न कर रहा हो।

इस फैसले के साथ ही अदालत ने आरोपी पति और उसके परिवार के खिलाफ दर्ज एफआईआर (FIR) और निचली अदालत में लंबित कार्यवाही को निरस्त कर दिया। कोर्ट ने माना कि अभियोजन पक्ष ऐसे कोई सबूत पेश करने में विफल रहा जिससे यह साबित हो सके कि पति ने अपनी पत्नी को जान देने के लिए उकसाया था। यह निर्णय उन मामलों में बचाव पक्ष के लिए एक ढाल की तरह देखा जा रहा है जहाँ केवल घरेलू कलह या विवाहेतर संबंधों को आत्महत्या का कारण बताकर पूरे परिवार पर केस दर्ज करा दिया जाता है।

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि इस फैसले से धारा 306 के दुरुपयोग पर लगाम लगेगी। हालांकि, कोर्ट ने यह भी साफ किया कि यह फैसला केवल 'उकसाने' के आरोप तक सीमित है। अन्य कानूनी उपचार जैसे कि घरेलू हिंसा या क्रूरता के मामले परिस्थितियों के आधार पर अलग से देखे जा सकते हैं। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का यह आदेश वर्तमान सामाजिक और कानूनी ढांचे में वैवाहिक संबंधों की जटिलताओं को समझने की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है।

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