बिलासपुर: CG HC : छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने राज्य सरकार की उस अपील को खारिज कर दिया है, जिसमें एक आरोपी को दुष्कर्म और SC/ST एक्ट के आरोपों से बरी करने के फैसले को चुनौती दी गई थी। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि 'सहमति' (Consent) और 'जबरदस्ती' के बीच का अंतर कानूनी रूप से बहुत महत्वपूर्ण है।
शादी का वादा और जाति का विवाद
यह मामला गरियाबंद जिले के इंदागांव थाने का है। पीड़िता ने जनवरी 2022 में आरोप लगाया था कि आरोपी धर्मेंद्र उसे मोटरसाइकिल पर बैठाकर अपने गांव ले गया। वहां शादी का झांसा देकर संबंध बनाए, लेकिन बाद में "जाति अलग होने" का हवाला देकर विवाह करने से मुकर गया। पुलिस ने इसके आधार पर रेप और SC/ST एक्ट के तहत केस दर्ज किया था।
इन 3 वजहों से हाईकोर्ट ने खारिज की सरकार की अपील
मेडिकल रिपोर्ट का अभाव: चिकित्सकीय परीक्षण में पीड़िता के शरीर पर कोई बाहरी या आंतरिक चोट नहीं मिली। डॉक्टर ने 'जबरदस्ती' की पुष्टि नहीं की।
पीड़िता का मुकर जाना: अदालत में सुनवाई के दौरान पीड़िता ने स्वीकार किया कि वह अपनी मर्जी से आरोपी के साथ गई थी। उसने यह भी माना कि पुलिस और परिजनों के कहने पर उसने पहले बयान दिए थे।
कानूनी नजीर (Precedent): हाईकोर्ट ने 'जाफरुद्दीन बनाम केरल राज्य' मामले का जिक्र करते हुए कहा कि यदि निचली अदालत का फैसला पूरी तरह असंभव या अवैध न हो, तो उसमें हस्तक्षेप नहीं किया जाना चाहिए।
न्यायालय की महत्वपूर्ण टिप्पणी
जब मूल अपराध (रेप और अपहरण) ही सिद्ध नहीं हो पा रहा है, तो ऐसी स्थिति में अनुसूचित जाति एवं जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के आरोप भी स्वत: ही समाप्त हो जाते हैं।








