छत्तीसगढ़ के नए घोषित गुरु घासीदास-तमोर पिंगला टाइगर रिजर्व को आबाद करने के लिए वन विभाग ने एक बड़ी योजना तैयार की है। इसके तहत पड़ोसी राज्य मध्य प्रदेश (MP) से बाघों को छत्तीसगढ़ लाने (Relocation) की तैयारी चल रही है। विभाग का मानना है कि इससे राज्य में बाघों की संख्या बढ़ेगी और टाइगर रिजर्व का इकोसिस्टम मजबूत होगा।
विवाद की वजह: अपना बाघ क्यों है कैद?
एक ओर जहाँ विभाग दूसरे राज्य से बाघ लाने के लिए करोड़ों खर्च करने को तैयार है, वहीं दूसरी ओर छत्तीसगढ़ का अपना एक स्वस्थ और युवा बाघ पिछले काफी समय से कैद में है।
मामला क्या है? इस बाघ को मानव-वन्यजीव संघर्ष की आशंका के चलते पकड़ा गया था।
विशेषज्ञों की राय: वन्यजीव विशेषज्ञों का कहना है कि यह बाघ पूरी तरह स्वस्थ है और शिकार करने में सक्षम है। इसे वापस जंगल में छोड़ने के बजाय पिंजरे में रखना समझ से परे है।
ट्रांसलोकेशन पर उठ रहे सवाल
वन्यजीव प्रेमियों और विशेषज्ञों ने विभाग की इस नीति पर सवाल खड़े किए हैं:
अनुकूलन (Adaptation): दूसरे राज्य (MP) से आने वाले बाघों को छत्तीसगढ़ के जंगलों में ढलने में समय लगेगा और उनके अस्तित्व पर खतरा भी हो सकता है।
स्थानीय बाघ की अनदेखी: जब हमारे पास अपना स्थानीय बाघ मौजूद है, जो यहाँ की जलवायु और भूगोल से परिचित है, तो उसे रिहा करने के बजाय 'आयात' पर जोर क्यों दिया जा रहा है?
लागत का बोझ: दूसरे राज्यों से बाघ लाने और उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करने में भारी भरकम बजट खर्च होता है।
वन विभाग का तर्क
विभाग के अधिकारियों का कहना है कि मध्य प्रदेश से बाघों को लाना एक राष्ट्रीय स्तर के 'टाइगर रिलोकेशन प्रोजेक्ट' का हिस्सा है। इसका उद्देश्य जेनेटिक विविधता (Genetic Diversity) को बढ़ाना है। कैद में मौजूद बाघ के संबंध में विभाग का कहना है कि उसकी सुरक्षा और व्यवहार का अध्ययन किया जा रहा है, जिसके बाद ही उसे मुक्त करने पर निर्णय लिया जाएगा।
टाइगर स्टेट की खोई गरिमा वापस पाने की चुनौती
छत्तीसगढ़ कभी बाघों के लिए जाना जाता था, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में यहाँ बाघों की संख्या में भारी गिरावट आई है। अब नए टाइगर रिजर्व के माध्यम से राज्य फिर से अपनी पहचान बनाना चाहता है। हालांकि, विशेषज्ञों का कहना है कि यह तभी संभव होगा जब विभाग बाहरी बाघों को लाने के साथ-साथ मौजूदा स्थानीय बाघों के संरक्षण पर भी ध्यान दे।

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