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BMC vs MCD: मुंबई और दिल्ली में कैसे चुना जाता है मेयर? जानें दोनों के बीच का बड़ा अंतर और शक्तियां

महाराष्ट्र के 29 नगर निगमों के साथ मुंबई महानगरपालिका (BMC) के चुनाव संपन्न होने के बाद अब सबकी नजरें मेयर और डिप्टी मेयर के चुनाव पर टिकी हैं। मुंबई में मेयर का चुनाव सीधे जनता द्वारा नहीं किया जाता, बल्कि हर वार्ड से चुने गए पार्षद (कॉन्सलर) मिलकर मेयर का चुनाव करते हैं। यही प्रक्रिया दिल्ली नगर निगम (MCD) में भी अपनाई जाती है, जहाँ निर्वाचित पार्षद ही अपने मेयर का चयन करते हैं। हालांकि, दोनों शहरों में चुनाव की यह समानता होने के बावजूद इनके कार्यकाल और नियमों में बड़े अंतर मौजूद हैं।

कार्यकाल की बात करें तो मुंबई और दिल्ली के सिस्टम में जमीन-आसमान का फर्क है। मुंबई में मेयर का कार्यकाल 2.5 वर्षों का होता है, जिसका अर्थ है कि एक पार्षद अपने 5 साल के कार्यकाल में दो बार मेयर चुनने का अवसर पाता है। इसके विपरीत, दिल्ली एमसीडी में मेयर का कार्यकाल मात्र 1 वर्ष का होता है और यहाँ हर साल चुनाव आयोजित किए जाते हैं। दिल्ली में मेयर पद के लिए रोटेशन प्रणाली लागू है, जिसके तहत महिला, सामान्य वर्ग और अनुसूचित जाति/जनजाति के उम्मीदवारों के लिए क्रम निर्धारित होता है।
दिल्ली की स्थिति राष्ट्रीय राजधानी होने के कारण मुंबई से थोड़ी अलग है। यहाँ नगर निगम का गठन विधानसभा और संसद के कानूनों के तहत होता है, जिससे मेयर के चुनाव में पार्षदों के साथ-साथ सांसदों और विधायकों की भी अहम भूमिका होती है। वहीं, मुंबई में बीएमसी पूरी तरह से महाराष्ट्र सरकार के अधिनियमों के तहत काम करती है। दोनों ही निकायों में मनोनीत सदस्यों की व्यवस्था है और काम को सुचारू रूप से चलाने के लिए विभिन्न समितियों का गठन किया जाता है।
शक्तियों के मामले में एक रोचक तथ्य यह है कि मुंबई और दिल्ली दोनों ही शहरों के मेयर के पास कोई वास्तविक प्रशासनिक या वित्तीय शक्ति नहीं होती। मेयर मुख्य रूप से निगम की बैठकों की अध्यक्षता करते हैं और शहर के प्रथम नागरिक के रूप में औपचारिक भूमिका निभाते हैं। असली शक्ति और नियंत्रण नगर आयुक्त (म्युनिसिपल कमिश्नर) के पास होता है, जो राज्य सरकार द्वारा नियुक्त एक आईएएस अधिकारी होता है। मेयर न तो बजट तैयार कर सकते हैं और न ही किसी बड़ी परियोजना को स्वतंत्र रूप से मंजूरी दे सकते हैं।
बीएमसी चुनाव 2026 के नतीजों के बाद अब राजनीतिक समीकरणों का दौर शुरू हो गया है। बीजेपी और अन्य दलों के बीच गठबंधन की चर्चाएं तेज हैं ताकि जादुई आंकड़े तक पहुंचकर मेयर पद पर कब्जा किया जा सके। प्रशासनिक रूप से भले ही मेयर की शक्तियां सीमित हों, लेकिन राजनीतिक रूप से यह पद बेहद रसूख वाला माना जाता है क्योंकि बीएमसी का बजट कई छोटे राज्यों के बजट से भी बड़ा होता है। अब देखना होगा कि मुंबई की सत्ता की चाबी किसके हाथ में आती है।






