बिलासपुर: न्यायधानी बिलासपुर में सरकारी खजाने में सेंधमारी का एक सनसनीखेज मामला सामने आया है, जहाँ फर्जी मेडिकल बिलों के आधार पर 30 लाख रुपये की राशि निकाल ली गई। हैरान करने वाली बात यह है कि इस गंभीर वित्तीय अनियमितता का खुलासा हुए 5 महीने से अधिक का समय बीत चुका है, लेकिन अब तक दोषी के खिलाफ प्राथमिकी (FIR) दर्ज नहीं की गई है। प्रशासनिक स्तर पर कार्रवाई की यह कछुआ चाल अब कई बड़े सवाल खड़े कर रही है।
क्या है पूरा मामला?
जानकारी के अनुसार, संबंधित विभाग में पदस्थ एक कर्मचारी/आरोपी ने कूट रचित दस्तावेजों और फर्जी मेडिकल देयकों का सहारा लेकर शासन को लाखों रुपये का चूना लगाया। विभागीय जांच में प्रथम दृष्टया गबन की पुष्टि भी हो गई है। बावजूद इसके, पुलिस में शिकायत दर्ज कराने की प्रक्रिया फाइल दर फाइल दबी हुई है।
प्रशासन की चुप्पी पर सवाल:
सूत्रों के अनुसार, जांच रिपोर्ट में स्पष्ट उल्लेख होने के बाद भी उच्चाधिकारियों द्वारा मामले को ठंडे बस्ते में डालना संदेहास्पद नजर आ रहा है। 5 महीनों का लंबा वक्त बीत जाने के बाद भी FIR न होना कहीं न कहीं आरोपी को संरक्षण देने या मामले को दबाने की कोशिश की ओर इशारा कर रहा है। नियमानुसार, सरकारी राशि के गबन के मामले में तत्काल कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए, लेकिन यहाँ प्रक्रिया की पेचीदगियों का बहाना बनाया जा रहा है।
इस विलंब के कारण न केवल रिकवरी (वसूली) प्रभावित हो रही है, बल्कि अन्य भ्रष्ट तत्वों के हौसले भी बुलंद हो रहे हैं। सामाजिक कार्यकर्ताओं और स्थानीय लोगों ने इस पर आपत्ति जताते हुए तत्काल एफआईआर दर्ज करने और संलिप्त अधिकारियों की जवाबदेही तय करने की मांग की है।








