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Bharatmala Scam: 12 खसरों में ही 43 करोड़ का 'खेल', तो 57 खसरों के राज खोलने से क्यों डर रही EOW? भ्रष्टाचार की जांच पर उठे सवाल...

Chhattisgarh RRT News Desk 09 February 2026

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रायपुर: देश की महत्वाकांक्षी 'भारतमला परियोजना' छत्तीसगढ़ में भू-माफियाओं और भ्रष्ट अधिकारियों के लिए 'सोने की खदान' बन गई है। ताजा रिपोर्टों के अनुसार, रायपुर के अभनपुर बेल्ट में भूमि अधिग्रहण के दौरान केवल 12 खसरा नंबरों की जांच में ही 43.18 करोड़ रुपये के फर्जीवाड़े का खुलासा हुआ है। लेकिन चौंकाने वाली बात यह है कि कुल 69 संदिग्ध खसरों में से शेष 57 खसरों की फाइलें अब भी धूल फांक रही हैं। आरोप है कि जांच की धीमी रफ्तार के पीछे बड़े सफेदपोशों और रसूखदार अफसरों को बचाने की कोशिश की जा रही है।

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कैसे हुआ करोड़ों का वारा-न्यारा?

घोटाले का तरीका बेहद शातिर था। जैसे ही भारतमाला प्रोजेक्ट की घोषणा हुई, राजस्व विभाग के अधिकारियों ने भू-माफियाओं के साथ मिलकर एक सुनियोजित सिंडिकेट बनाया:

कृत्रिम बंटवारा (Artificial Splitting): बड़ी जमीनों को बैक-डेट में छोटे-छोटे टुकड़ों (खसरों) में बांट दिया गया ताकि प्रति टुकड़ा मिलने वाला मुआवजा कई गुना बढ़ जाए।

फर्जी नाम: राजस्व रिकॉर्ड में रातों-रात नए नाम जोड़े गए ताकि मुआवजे की राशि को अलग-अलग खातों में खपाया जा सके।

सरकारी जमीन का खेल: नायकबांधा जलाशय जैसी सरकारी जमीनों का भी निजी नाम पर फर्जी नामांतरण कर मुआवजा हड़प लिया गया।

EOW की कार्यशैली पर खड़े होते 3 बड़े सवाल

सीमित जांच क्यों?: जब 12 खसरों में 43 करोड़ का घोटाला मिला, तो शेष 57 खसरों (जहां गड़बड़ी की शिकायतें पहले से हैं) की जांच शुरू करने में देरी क्यों की जा रही है?

सिस्टम पर सवाल: अब तक केवल कुछ पटवारियों और निचले स्तर के क्लर्कों पर ही गाज गिरी है। क्या बिना किसी 'बड़े हाथ' के इतना बड़ा सिंडिकेट संभव था?

ED की एंट्री: इस मामले में प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने भी छापेमारी कर कैश और डिजिटल सबूत जब्त किए हैं। ईओडब्ल्यू की सुस्ती क्या केंद्र और राज्य की जांच एजेंसियों के बीच तालमेल की कमी दर्शाती है?

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