छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक पहचान और आदिम परंपराओं का सबसे बड़ा उत्सव 'बस्तर पांडुम 2026' आज यानी 10 जनवरी से पूरे उत्साह के साथ शुरू हो गया है। मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने माँ दंतेश्वरी के आशीर्वाद से इस भव्य आयोजन का लोगो और थीम सांग पहले ही जारी कर दिया था। इस वर्ष 'पांडुम' (जिसका अर्थ 'पर्व' होता है) को वैश्विक स्तर पर पहचान दिलाने के लिए इसे पिछले साल की तुलना में कहीं अधिक बड़े और आकर्षक स्वरूप में आयोजित किया जा रहा है। इसका मुख्य उद्देश्य बस्तर की लुप्त होती कलाओं, लोक गीतों और पारंपरिक जीवनशैली को सहेजना और दुनिया के सामने पेश करना है।
इस वर्ष बस्तर पांडुम को तीन प्रमुख चरणों में विभाजित किया गया है, ताकि ग्राम पंचायत स्तर से लेकर संभाग स्तर तक के कलाकारों को मंच मिल सके। पहला चरण (जनपद स्तर) 10 जनवरी से 20 जनवरी तक चलेगा। इसके बाद दूसरा चरण (जिला स्तर) 24 से 30 जनवरी के बीच आयोजित होगा। इस महाकुंभ का भव्य समापन (संभाग/राज्य स्तर) 1 से 5 फरवरी 2026 को होगा। इस आयोजन में बस्तर संभाग के सातों जिलों की 1885 ग्राम पंचायतों और 32 जनपद पंचायतों के हजारों कलाकार अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन करेंगे।
आयोजन की सबसे खास बात यह है कि इस बार सांस्कृतिक विधाओं की संख्या 7 से बढ़ाकर 12 कर दी गई है। इनमें जनजातीय नृत्य, लोक गीत, पारंपरिक वाद्ययंत्र, वेशभूषा व आभूषण, शिल्प कला, चित्रकला, पारंपरिक पूजा पद्धति, आंचलिक साहित्य और वन-औषधि ज्ञान जैसे महत्वपूर्ण विषय शामिल हैं। इसके साथ ही, बस्तर के पारंपरिक व्यंजनों और पेय पदार्थों (जैसे सल्फी और लांदा) की प्रदर्शनी भी लगाई जा रही है, जो पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र होगी।
मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने हाल ही में महामहिम राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू से मुलाकात कर उन्हें इस महोत्सव में मुख्य अतिथि के रूप में आमंत्रित किया है। सरकार की योजना विभिन्न देशों के राजदूतों को भी बस्तर बुलाने की है, ताकि यहाँ के हस्तशिल्प और पर्यटन को अंतरराष्ट्रीय पहचान मिल सके। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने भी इस पहल की सराहना करते हुए कहा था कि जहाँ कभी गोलियों की गूँज सुनाई देती थी, अब वहां लोक संगीत और विकास की गूँज सुनाई देगी।
बस्तर पांडुम केवल एक उत्सव नहीं, बल्कि बस्तर के 'संघर्ष से सृजन' तक के सफर की कहानी है। प्रशासन ने इस आयोजन के लिए लगभग 5 करोड़ रुपये का बजट आवंटित किया है। इस महोत्सव के माध्यम से माड़िया, मुरिया, गोंड और हल्बा जैसी विभिन्न जनजातियों के लोक जीवन को करीब से देखने का अवसर मिलेगा। यह आयोजन न केवल बस्तर की सांस्कृतिक अस्मिता को मजबूत करेगा, बल्कि क्षेत्र में इको-टूरिज्म और स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी नई गति प्रदान करेगा।








