बस्तर के जंगलों में कभी लाल आतंक और खौफ का प्रतीक माने जाने वाले माओवादी नेताओं के स्मारक अब ढहते इतिहास का हिस्सा बन रहे हैं। ताज़ा आंकड़ों के अनुसार, पिछले एक वर्ष के भीतर 70 से अधिक ऐसे ढांचों को सुरक्षा बलों ने बुलडोजर और अन्य माध्यमों से ध्वस्त कर दिया है। ये स्मारक अक्सर उन अंदरूनी गांवों में बनाए गए थे जहाँ सुरक्षा बलों की पहुंच नहीं थी, ताकि ग्रामीणों पर मनोवैज्ञानिक दबाव बनाया जा सके।
फरवरी 2026: बीजापुर और सुकमा में बड़ी कार्रवाई
हालिया कुछ दिनों में इस अभियान ने और गति पकड़ी है:
बीजापुर अपडेट: 13 और 14 फरवरी 2026 को बीजापुर के तर्रेम और उसूर थाना क्षेत्रों में 6 स्मारकों को ध्वस्त किया गया। इसमें माओवादी नेता बसव राजू और रमन्ना के प्रमुख स्मारक भी शामिल हैं।
सुकमा अपडेट: सुकमा के बुर्कलंका और पिड़मेल (डब्बाकोन्टा क्षेत्र) में वर्षों पुराने विशाल स्मारकों को सीआरपीएफ की 50वीं बटालियन ने बुलडोजर की मदद से जमींदोज कर दिया।
रणनीतिक झटका: अधिकारियों के अनुसार, ये स्मारक केवल ईंट-पत्थर के ढांचे नहीं थे, बल्कि नक्सलियों के 'शहादत' वाले नैरेटिव को जिंदा रखने के हथियार थे।
मिशन मार्च 2026: माओवाद मुक्त भारत का संकल्प
केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने हाल ही में 'बस्तर पंडुम 2026' के दौरान दोहराया था कि 31 मार्च 2026 तक देश से नक्सलवाद का पूरी तरह सफाया कर दिया जाएगा। मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के नेतृत्व में छत्तीसगढ़ सरकार इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए दोहरी रणनीति पर काम कर रही है:
सख्त प्रहार: नक्सली कैंपों और प्रतीकों पर बुलडोजर कार्रवाई।
पूना मारगेम (नया रास्ता): आत्मसमर्पण करने वालों के लिए आकर्षक पुनर्वास नीति, जिसके तहत हाल ही में 1.61 करोड़ के इनामी 51 नक्सलियों ने सरेंडर किया है।
बदलाव की आवाज़: बीजापुर के एक स्थानीय सरपंच का कहना है, "इन स्मारकों के रहते गांव में हमेशा डर बना रहता था। अब स्मारक टूटे हैं और विकास की सड़कें आ रही हैं। अब नारों की जगह स्कूल की घंटियां गूंज रही हैं।"








